Friday, December 21, 2012

क्या आप विवश हैं? तो आजमाइये जानने के अधिकारको


क्या आप विवश हैं? तो आजमाइये जानने के अधिकारको



by Leena Mehendale on Friday, December 21, 2012 at 7:53pm ·

क्या आप विवश हैं ?
-- क्या आपको कभी कभी लगता है कि भारतीय लोकतंत्रको सबल बनानेके लिये मैं तो कुछ करना चाहती या चाहता हूँ, पर क्या करूँ, क्या करूँ, क्या करूँ ? पूरा आकाश ही फट रहा है, कहाँ कहाँ कैसे पैबंद लगाऊँ ? कौनसी कारगर सुई ढूँढूँ ताकि आरंभ तो कर सकूँ ? 
ऐसी एक सुई आपके पास है -- जाननेके अधिकारके अंतर्गत -- उसे पैना करके इस्तेमाल करनेमें कितनी आश्वस्ति होगी ।

पहले एक कल्पना-चित्र को देखते हैं -- आप दिल्ली की डीटीसी बससे सफर में हैं। अचानक आम कपडों में एक रोबीला व्यक्ति बस में चढती या चढता है । दो मिनट जायका लेकर वह बताता है --" मैं अमुक अमुक -- दिल्ली पुलिस का डिप्टी कमिशनर ( या असिस्टंट  कमिशनर) हूँ । आपके रॅण्डम सुझाव समक्ष सुनने आया हूँ । आप यदा कदा मेरे ऑफिसमें लिखकर भी भेज सकते हैं। मैं आगे भी यूँ ही यदा-कदा आया करूँगा। कभी कभी अपने के प्रकट किये बिना रहूँगा।"  फिर वह थोडी देर सबकी राय-सुझाव सुनकर उतर जाता है। यदि किसीने आग्रह किया तो वह अपना आइडेंडिटी कार्ड भी दिखा देता है।

क्या आपको लगता है कि इससे दिल्लीकी कानून व्यवस्था में सुधार होगा ? और यदि आपको ऐसा लगता है तो क्या आपके पास इसका आग्रह धरने का कोई रास्ता है ?

अब एक दूसरा कल्पना-चित्र देखते हैं -- मान लो आपने जानने के अधिकार के अंतर्गत निम्न जानकारी पूछी -- 
  • १-१-२०११ से अबतक दिल्ली पुलिस के असिस्टंट कमिशनर या उससे वरिष्ठ कितने अधिकारियों ने कमसे कम १५ मिनट का सफर दिल्ली के  डीटीसी बससे तय किया है -- उनके नाम तथा सफर का दिनांक व समय बताया जाय। इसमें से कितनी बार अपनी आईडेंटिटी जाहीर करते हुए किया?
  • १-१-२०११ से अबतक पुलिय कमिशनरने कितनी बार अपने मातहत अधिकारियों के साथ लम्बी (कमसे कम एक घंटे के कालावधिकी) बैठकें की- दिनांक और समय बताया जाय। इनमें से कितनी बार दिल्ली में महिला सुरक्षा का विषय अजेंडे पर लेकर चर्चा की गई- क्या  उसके परिणामों की चर्चा अगली बैठक में की गई  ?
अब यदि इस कल्पना चित्र से खुश होकर आपमें से कोई वाकई में दिल्ली पुलिस कमिशनरसे यह सवाल पूछने निकलते हों तो मेरी विनती रहेगी कि लम्बे सवाल या लम्बी कालावधि से संबंधित सवाल न पूछें । हमारा प्रयास उन्हें समझाने भर के लिये है कि उनका अपना काम अधिक कार्यक्षमता से करने के साथ साथ लोगों का भरोसा भी जीतना हो तो कितने कम प्रयासों की आवश्यकता है। आपके इन छोटे सवालों से यह बात उनकी समझ में आ जायगी। असल में कई सरकारी काम निपटाने के सरलसे से तरीके होते हैं पर वरिष्ठ अधिकारी दैनंदिन फाइलों में ही अपने को इतना उलझा लेते हैं कि ऐसे सरल उपाय उनकी निगाह से ओझल हो जाते हैं। और आपके रोजमर्रा के कामों में आपके पास भी इतना समय बार बार कहाँ से आयगा कि आप लम्बे सवाल पूछ सकें -- पर हाँ लोकतंत्र  बचाये रखना की जो पहली शर्त है -- सजगता -- उसे सरल तरीके से यदा कदा हम दर्शाते रहें तो फटे आकाश में पैबंद का एक एक टाँका लगता रहेगा और जब कई लोग इस प्रक्रिया में जुडेंगे तो लोकतंत्र बना रहेगा। तथास्तु-- आप सबके सहयोगसे ऐसा ही हो ।
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Wednesday, December 19, 2012

Draft Volunteer Training Module


Draft of the Volunteer Training Module
(This was sent to me by Kanan Jaiswal for comments -- my comments are in red)
[There will be four training sessions, each of one and a half hours, and the style of training will be highly interactive]
Those who are coming to volunteer are already motivated – but it is an amorphous group, needing coherrence in their attitude and action. Hence my comments
Session 1 : Introduction – [PIU -- “Pl introduce urself” session ]
A. Current political scenario and Background.
B. Why a new political formation called for? Why the extant outfits cannot deliver?
C. Why the India Against Corruption campaign and agitation needs to be channelised politically? Why is a general awareness movement divorced from electoral politics not the answer?
[ candidly accept what were ur shortcomings last year when u felt that “We The People” concept was more powerful than elected representatives –My own suggestion – Do not give a bye-bye to that as  we need a mix of the two. Pl see my views here http://rajkeeya-chintan.blogspot.in/2012/08/team-anna_10.html  ]
Similarly this number game cannot be won unless there is a paradigm shift – in favour of 2 character-indicators – Honesty and Skills – This aspect should be discussed widely.
Session 2 : Let Us Formalise Our Mission and objectives
[If possible circulate these below-mentioned views beforehand.]

  • Through decentralisation and devolution of power, this party seeks to change the rules of the game. 
  • It aims to make the people, and not those occupying positions of power in the national and state capitals, the real decision makers in matters of great importance like land, waters, forests, mining, education, health, and nutrition. 
  • It also aims at making governance transparent and corruption-free 
  •              by having persons of high integrity in the government 
  •              and also by making systemic changes that would almost  banish malfeasance whatever be the composition of the government.
  •  The party would swear by inner party democracy with the so-called high command having no say in the selection of candidates for elections. 
  • The Jan Lokpal will be made a reality and 
  • the rights to reject and recall enshrined in the People’s Representation Act. India will progress to a real democracy in which, as before, people will choose their representatives in free and fair elections held at regular intervals, but now they will also exercise control over those representatives and the rule of law – Be you ever so high, the law is above you – will prevail in the country.

Also in this session the following will be covered:
who are the leaders and their qualifications and convictions – Introduction to the core party leaders – KYL (Know Your Leaders)
the party's 'mission statement' – Let Us Finalise
what are its short term goals ---- Let Us Finalise
what are the long term goals ---- Let Us Finalise
who can be selected a candidate for elections and how to choose them
what do they need for success - Let Us Finalise
how are they going to be different from the 'others' -  Let Us Finalise
Let Us Be Prepared for--

  • Best Case scenario : the party wins a majority. Unfold plans and programmes, many described above, it will undertake and legislate on.
  • Worst Case scenario : Our efforts do not translate into Parliamentary seats, even then, we would have made a dent, we would have shaken  other political parties out of their complacency, we would have compelled them to reorder their agenda, and re-prioritize. For example, the Green Party has not formed government in any country of Western Europe, but it has brought environmental concerns centre stage. It is now an integral part of every political party's election manifesto.


Session 3 : Pre-requisites for a volunteer and how to develop them
(This session is meant for whom ??? )
U R HERE WITH --  
           •complete understanding of the party's mission and objectives
           •impeccable integrity
           •enthusiasm
           •energy through good health
           •courage
           •commitment
           •empathy and concern
           •communication, including non-verbal, skills
           • ability to work in a team
           •loyalty, yet independence of mind
           •as much respect for means as for the ends
and above all, a deep seated desire to make our country better
Hence let us make a HRM Chart (Human Resource Management) by tabulating – (I presume part-time working)
Name 
Age
Geog. Area of work
For next how many  years
Prefered Sector of work

Team – formation for next 1 yr.

Session 4 : Support mechanism for volunteers and open house for questions and answers.

Wednesday, December 12, 2012

जानिए, अन्ना हजारे कौन है


जानिए, अन्ना हजारे कौन है

लीना मेहेन्दले 
फेसबुक पर और 

बना रहे बनारस   पर भी


पिछले दिनों में अण्णा हजारे के बाबत काफी कीचड उछालने का प्रयास हुआ तो मुझे लगा कि एक मराठी माणूस ( मराठी व्यक्ति) होनेके नाते मुझे जो थोडी अधिक जानकारी है, उसे अन्य प्रांतवासियों तक पहुँचाऊँ। पर यह कहानी कुछ पीछे से शुरु करनी पडेगी --  1947 से  । लेकिन पहले यह कहना होगा कि अपना पक्ष रखनें में अण्णा समर्थ हैं, सो यह कोई मैं उनकी ओरसे नही लिख रही। न ही मैं उनके जनलोकपाल बिल वाली संस्थासे संबंधित हूँ -- बल्कि कुछ मुद्दों पर मेरा मत अलग भी है।

आजादी के बाद शायद महाराष्ट्रमें ही ऐसी अधिकतम घटनाएँ हुईं जिसने विस्तृत परिणाममें उथलपुथल मचाई। उनका परिणाम 1978 के लोकसभा चुनावों पर भी था जिसमें कॉंग्रेस पक्ष हारा । यशवंतराव चव्हाण और उनके राजकीय वारिस शरद पवारने पक्ष छोडा। अगले वर्ष महाराष्ट्र विधानसभा चुनावमें और उसके बादसे विधानसभा  चार  प्रमुख पक्षोंमें बँट गई -- कॉंग्रेस, NCP, भाजपा, शिवसेना । केवल एक बार NCP,ने भाजपासे हाथ मिलाकर सरकार बनाई अन्यथा हमेशा NCP के साथ कॉंग्रेसी सरकार ही रही। शरद पवार का कद बढते बढते वे सबसे बडे साहब बन गये।

इस बीच बहुत छोटे पैमाने पर एक छोटेसे गाँवमें अण्णा हजारेने ग्रामोत्थान का काम आरंभ किया -- ग्राम सफाई, फिर जलसंधारण (अर्थात पानी बचाना), पानीका न्यायसंगत बँटवारा, वृक्षारोपण। अब लोग सम्मान करने लगे।जब अण्णाने देखा कि गाँव की मेहनत की कमाई तो शराब में जा पही है, तो कार्यक्रमकी दिशा बदली।

हालमें कुछ पाँच-सितारा पत्रकारों ने लिखा है कि उस जमानेमें अण्णाने गुंडागिरी की, कानून हाथमें लिया और गाँववालोंको पीटा। वास्तव यह है कि जब उन्होंने महिलाओंसे पूछा तो सबने दुहाई दी कि हमारे बच्चे रोज भूखे सो जाते हैं। विदेशी शराबपर घंटेभरमें 5-6 हजार रुपये उडा पानेवाले पत्रकार को कहाँ यह समझ होगी कि 25 रु रोज कमानेवाला जब उतने पैसेकी शराब खरीदता है तो उसके घरमें क्या होता है। सो महिलाओंकी क्षमता को अण्णा ने एक नया आयाम दिया। महिलाओंने अपने पतियोंकी शराब छुडवाई। पर जब कोई अत्यधिक दुराग्रही पति बहकने लगा तो अण्णा घरवाली स्त्रियोंसे पूछते कि इसकी सजा क्या हो। कईयोंकी माँ और पत्नीने सजा सुनाई की इनकी पिटाई हो। पर धीरे धीरे गाँव सुधर रहा था, संपन्न हो रहा था और अण्णाका विरोध   बंद हो गया। राळेगणसिद्धी अब एक आदर्श ग्राम बन गया कुछ इनाम जीते और अमुल संस्थाने भी इस प्रयास का महत्व समझकर अपने ट्रेनी भेजे। ग्राम-विकास विभागके अधिकारी, सरकारी ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट के अधिकारी यह प्रयोग देखने आते कि इस प्रयोग को कैसे रेप्लिकेट किया जाय। कुछ वर्षों बाद इसी गाँवके पगचिह्नोंपर चलकर हिवरे-बाजार नामक दूसरे गाँवने यही प्रयोग सफलतापूर्वक किया। वो पत्रकार जान लें कि गुंडागिरीसे फॉलोअर नही पैदा होते।

लेकिन जब ये ग्रामसुधारके काम हो रहे थे तो अण्णा व गाँववालोंने करप्शन को भी झेला है। चाहे वह सिंचाई-निभागके डिप्टी इंजिनियरका हो या शराबके ठेकेको रिन्यू करनेवाले अधिकारी हों। कभी कभी उनके विरुद्ध सरकार का ध्यान खींचने के लिये छोटामोटा उपोषण भी किया। अब अण्णाको लगने लगा कि करप्शन की बिमारी जो बडे पैमानेपर फैली है उसे समाजसे निकलना होगा और यह संभव भी है।

1980 -1990 के कालखंड में महाराष्ट्र की सहकारिता-आधारित चीनी मिलें और कॅपिटेशन-फीस-आधरित शिक्षा-व्यवस्था दोनों ही भ्रष्टाचार के केंद्र बन रहे थे। साथही घरेलू ट्रस्ट बनाकर सरकारी जमीनें आबंटित करवानेकी शगल नें भी जोर पकडा था।भूखंडका श्रीखंड -- ये एक मुहावरा बन गया। मंत्रीगणों की जमीन बटोरनेकी प्यास बढती गई। जब अण्णाने अपने गाँवके स्तरसे उठकर राज्यस्तर पर भ्रष्टाचार का विरोध करना चाहा तो सबसे पहला टकराव शरद पवारके साथ होना था। वह इतना तेज हुआ कि इतिहास में पहली बार 1994 के विधान-सभा चुनाव में भ्रष्टाचारके मुद्देपर कॉंग्रेस व पवार-कॉंग्रेस हारे और शिवसेना-भाजपाकी सरकार आई। आगे चलकर यही बात लेकर अण्णा को मरवाने के लिये 1 लाख रुपये की सुपारी दी गई --  एक ऐसे क्रिमिनलको जिसने दुसरी सुपारी  के टार्गेटको तो मार डाला। पिछले वर्ष वह पकडा गया तो उसने बताया कि अण्णाकी सुपारी का पैसा उसने इसलिये ठुकरा दिया था कि उस जैसे क्रिमिनलको भी लगा कि इस संत आदमीको मैं क्यों मारूँ । सुपारी देनेवालेका नाम उसने बताया –पदमसिंह पाटील, अर्थात् शरद पवार के बहनोई जो सुपारी देनेके समय मंत्री थे और अब इस आरोपके कारण जेलमें हैं। लेकिन ये अब की बात है।

1995 में शिवसेना-भाजपा सरकारने अण्णासे प्रेरणा लेकर सरकारने 125 गाँवोंको रालेगण-सिद्धी के तर्ज पर आदर्श गाँव बनाने का टार्गेट तय किया । उधर अण्णाकी प्रेरणा लेकर कई जिलों में भ्रष्टाचार विरोधी समितियाँ बनीं और एक प्रकारकी सरलता  की रौ में अण्णाने भी उनका मौन या प्रकट समर्थन किया। 

सरकारी आदर्श-ग्राम योजना फेल हुई क्योंकि असल मुद्दा ये था कि गाँववाले अपना सुधार किस दिशामें चाहते हैं और क्या उसमें अंत्योदयकी संकल्पना शामिल है। सरकारी स्कीममें अधिकारियोंपर ये जिम्मा था कि गाँवके विकास की दिशा व राह वे ढूँढेंगे,  वह भी सेवाभावी संस्थाओंसे प्रोजेक्ट प्रपोजल बनवाकर। ऐसेमें कई रंगीन, आकर्षक, परन्तु काल्पनिक प्रोजेक्ट प्रपोजल बने, बजेट खर्च  होता रहा और स्कीम फ्लॉप हुई। उधर भ्रष्टाचार-विरोधी जिला -समितियाँ भी कई बार बदनाम लोगोंके हाथ चढ गईं और अन्ततः सारी बंद भी हो गईं। परन्तु इनके आधार पर यह कहना कि अण्णाने भ्रष्टाचार किया है -- गलत होगा। यह मुद्दा इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस कारण अण्णाको बदनामी व दिक्कतें उठानी पडी हैं।

शिवसेना-भाजपा सरकारके मंत्रियोंने भी जल्दी ही भ्रष्टाचार के गुर जान लिये और हालत इतनी बिगडी कि चार भ्रष्ट मंत्रियोंके विरुद्ध अण्णाने मुहिम छेडी। एक शिवणकर चुपचाप रिजाईन होकर चले गये, दूसरे सुतारको मंत्रीपदसे हटाकर सुनवाई कराई गई और उन्हे निर्दोष करार दिया क्योंकि हर बडी संपत्ति पर उनका जबाब था कि वह तो मैंने कार्पोरेटर था तब कमाई थी और आपकी अधिकार कक्षा में आपको केवल मंत्रीकालीन संपत्ती को खोजना है।

तीसरे मंत्री बबन घोलप अधिक तेज-तर्रार थे उन्होंने मानहानी का दावा ठोंक दिया । अण्णाने सरकारसे गुहार लगाई कि यह जाँच तो तुम्हे करनी है। पर सरकार मुकर गई – इसीसे बात समझमें आती है कि क्यों जाँच एजन्सी को सरकारी दायरेसे बाहर रखना जरूरी है। खैर, अदालतने अण्णापर जुर्माना ठोंका और जब अण्णाने कहा कि मेरे पास पैसे तो हैं नही, तो उन्हे जेल भेजा गया। इस प्रकार मुँह बाई जनता और हमारे जैसे वरिष्ठ अधिकारियोंने देखा कि कैसे सज्जनोंको जेल और आरोप रखनेवालोंको मंत्रीपद मिलता है।
चौथे मंत्री उससे भी अधिक तेज थे, पार्टी बदल-बदल कर सत्तामें रहना ही उनका धर्म था। कई वर्ष पूर्व अंतुले के इलेक्शन एजेंट रहते हुए एक अभूतपूर्व चाल से उन्हें जिताया था। पहले शरद पवारके मंत्री थे और अब शिवसेनाके। अपने ही जिलेके एस.पी और कलेक्टरको गोलीसे उडा देनेकी भाषा कर चुके थे। उन्होंने दे दनादन अण्णा पर भ्रष्टाचारके आरोप गढने शुरू किये। एफ.आय.आर. किये। इधर अण्णाको जेल में रखनेके कारण लोकक्षोभ बढ रहा था तो मनोहर जोशीने कोई खास सरकारी प्रिविलेज इस्तेमाल करते हुए उन्हें रिहा करवा दिया।

इस बीच फिरसे सरकार बदली फिरसे शरद पवारकी सत्ता आई और फिरसे टकराव आरंभ हुआ जिसमें फिर एक बार अण्णा द्वारा उठाये मुद्दोंपर और नबाब मलिक को मंत्रीपदसे हटना पडा। पदमसिंह पाटीलने ही सुपारी कांड किया जो आगे चलकर उजागर हुआ। लेकिन एक-दो को हटानेसे क्या होता है। करप्शनका राक्षस तो रक्तबीजकी हमारे समाजपर छा गया है। एक पकडा जाता है तबतक दसियों मंत्री भ्रष्टाचारकी चालसे सौ कदम आगे बढ चुके होते हैं। नतीजा है कि आज महाराष्ट्रके कई ऐसा राजनेता  हैं जो हजारों एकड जमीनके मालिक हो चुके हैं और उनकी भूख अभी मिटी नही है। इस खेलमें भी मिलबाँटकर खानेका चलन है जिससे विरोधी पक्ष भी अपनी अपनी कीमत वसूल कर चुप्पी लगा जाते हैं।

यही वजह है कि एप्रिल माहके आंदोलन के दौरान अण्णाने आपत्ति जताई थी कि उनसे बातचीत करने वाली सरकारी टीममें शरद पवार न हों। यही वजह है कि वे चाहते हैं कि जल्दीसे जल्दी एक सशक्त लोकपालबिल बने और वह सरकारके हाथकी कठपुतली न हो जिस तरह सीबीआय होती है। कर्नाटक के सशक्त लोकायुक्तने हमें दिखा दिया है कि सरकारसे अलग लोकायुक्त थे इसीलिये येडियुरप्पा और उनके भ्रष्टाचारी मंत्रियोंको हटाया जा सका। आज केंद्र सरकार डरती है कि यही लगाम उनपर भी लगे तो इलेक्शन जीतनेके लिये पैसा कहाँ से आयेगा – शायद पूरी घरानेशाही को ही राजकीय मंच छोडना पडे। भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को शायद इसी बातका डर है।

समय आ गया है जब संसद से ऊपर लोगों की प्रभुसत्ता को समझा जाय और उसे समय-समय पर किस प्रकार अभिव्यक्ति का मौका मिले इसकी भी चर्चा हो। हम अब देख चुके हैं कि इस प्रश्नका ऊत्तर संसद की स्थाई समिती भी नही है। इसीलिये जैसे आज हमें करप्शन के लिये संसद व सरकार से  संस्था की आवश्यकता हुई है, उसी प्रकार अण्णा के मौजूदा आंदोलन जैसे मौके को एक प्लॅटफॉर्म देने के लिये भी कोई नई व्यवस्था सोचनी पडेगी। भले ही संसद से बाहर हो,पर फिर भी उसपर अप्रजातांत्रिक होनेका आक्षेप न आ सके, ऐसा उस व्यवस्थाको होना पडेगा -- ऐसी व्यवस्था हमें ढूँढनी पडेगी।

Thursday, December 06, 2012

Time to revise outdated section 49-O

time to revise outdated 49 O

TEXT
Time to revise the outdated Rule 49-O 

Ref Election Commission Press Note No.ECI/PN/35/2008 
Dated: 5th December, 2008 

To: The Election Commissioner of India 

Sir, 

You are aware that Section 49-O of The Conduct of Electoral Rules, 1961 reads as under : 

Sec. 49-O Elector deciding not to vote:-- 
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If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression hereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark. 
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This rule was framed in 1961 after 2 general elections had been held in the country. It appears that in these 2 elections it came to the notice of ECI (Election Commission of India) that there are some voters who may not want to cast vote It is for such people that the Rules provided for the procedure of using form No.17-A as detailed in Section 49-O. For long people in this country have thought that this provision is made for those voters who have not liked the candidature of any of the contesting candidate. Otherwise why would any voter, who feels that none of the contesting candidates is worthy will still take the trouble to reach the polling booth and appear for voting? Would he/she not go to enjoy the holiday as indeed many of the voters who know that ECI does not care for their opinion do go away to a holiday picnic. Sadly your notification suggests that they were right and some of us who trusted our democratic principles were wrong. 

We wish to submit that the Rules framed in 1961 are today outdated and insufficient and fail to take proper cognizance of the feelings, decision and voting right of a voter as regards the candidates contesting the election. Most important aspect is that voting choice expressed through from 17-A is not counted its value is that of a waste-paper as indeed your notification seeks to confirm. 

Any voter, who feels that none of the contesting candidates is worthy of being elected and has still taken the trouble to reach the polling booth and appear for voting, definitely wishes his or her vote to be recorded and counted. Hence the present Section 49-O needs to be modified. It should now be provided that the Ballot paper will indicate NO CHOICE or None of the Above as one of the possible voting choices and the electronic machine will also provide for this choice and have a system to record and count the same. 

The Right to Express our choice through Vote is the highest right given in a democracy. Even when we wish to declare all the contesting candidates unworthy, our opinion MUST be recorded and counted during Election. Todays rules deny us this Fundamental Right. It is a matter of abrogation of our right. People in this country look up to you and expect you to be proactive and give a platform to their feeling. Hence we the undersigned request that necessary change in the Rules be made so that all the thinking voters get a right to record their opinion which should then be counted during the process of counting of votes and be declared while declaring the results of election. This will necessitate some further reforms which we hope, will occur eventually. 
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ed
  • (edpcra@hotmail.com)
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  • Also see 2 notifications of Election Commission which mention that this reco is made to GOI in 2001 and again in 2004. But no persuation?
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  • India
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  • В
http://eci.nic.in/eci_main/PROPOSED_ELECTORAL_REFORMS.pdf
See more comments on         http://www.petitiononline.com/petitions/fix_49_o/authors/print_petition

vishal agarwal
  • (vishal.slts@gmail.com)
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  • this is important
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  • Hisar, India
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  • 9



bharat kumar
  • (kushwaha.bharat@gmail.com)
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  • We all indians want this.
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  • Delhi


kanhayalal m rathod
  • (skanhayalal@yahoo.com)
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  • candidates are not abal for the chair, last year i tried but not i got so please put negative voting facility under section 49.0
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  • nipani taluka chikodi(constituency) dist.belgaum
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  • many younger and old man with me



Anil V. Maydeo
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  • there should be another button as to, clicking gives all the details of the Candidates, whether Criminal, and hence forth
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  • Mumbai
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  • 3



Dr. Mandar Akkalkotkar
  • (ayurvedscienceforum@gmail.com)
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  • How to get this done? Pl. do guide, so that further communication with law ministry/ Chief Election Commissioner can be made.
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  • Pune, India
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  • 1




  • kavitha
    • (forchakris@yahoo.com)
  • subhadra
    • (forchakris@yahoo.com)



Dr. Sher Singh
  • (doctorshersingh@yahoo.co.in)
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  • most of the people want to revise this Rule, several of them raise their voice, some take active acion in form of this compagin or otherwise, few of them sign it or support action of others and very few do not do anything except to wait for a change, however the sad seen of the fact is this that this very few is very big and this some is really very few, however good seen is this that NONE wants to withdraw this democracy, not even those who disrespects it. ITS MY GREAT DEMOCRACY WHERE UNDEMOCRATIC PEOPLE ARE ENJOYING THE DEMOCRACY AND DEMOCRATIC PEOPLE ARE SUFFERING AND PAYING FOR ITS EXISTANCE.
  • City, Country
  • Bhooda Gate, Post Office & Tahsil-DEEG, Dist. BHARATPUR, RAJASTHAN, INDIA- 321203
  • Number of signatories on whose behalf you are signing
  • Myself presently, however many others may also want the same






















































Saturday, December 01, 2012

जमीनदारी और रिटेल एफडीआई
29, Nov, 2012, Thursday  देशबंधु 
हस्तक्षेप  29-11-2012 

लीना महेंदेले
अपने देश में हजारों वर्षों से कृषि संस्कृति पनपी है। यही कृषि संस्कृति इतनी प्राचीन है कि जिस युग को हम सतयुग कहते हैं, और जिस युग में राजघराने भी नहीं होते थे, तब भी कृषि संस्कृति थी। तब कृषि भूमि का अधिकारी कुटुम्ब ही होता था। लेकिन जब राजव्यवस्था आई और राजे-रजवाड़े आए तो यह व्यवस्था चलाने के लिए धन और धान्य की आवश्यकता हुई। तब कृषि-उत्पादकों पर कर (टैक्स) लगाने की प्रथा बनी क्योंकि समाज का प्रमुख उत्पादक वही था। ऐसे कर पर राय का अधिकार हो और इसीलिए वह कर राय के कोषागार को सम्पन्न करता रहे, इस समाज-मान्यता प्राप्त थी। लेकिन इस कर के लिए किसान राजा के प्रति सीधा उत्तरदायी था। चाणक्य के अर्थशास्त्र में और उससे भी पुरातन ग्रंथों में नियम बनाए गए हैं कि कृषि-उत्पादकों से कर के रूप में धान्य या धन किस अनुपात में लिया जाए, सूखा या अतिवर्षा के कारण कृषि को नुकसान हो तो कर में किस प्रकार छूट दी जाए-इत्यादि।

ऐसी प्रथा, जिसमें किसान का उत्तरदायित्व सीधा राय-व्यवस्था या राजा के लिए होता था। इसका नाम है रयतवारी। लेकिन पिछले सहस्त्रक में भारत पर परकीय आक्रमण हुए। नए शासक विदेशों से यहां आए और राय करने लगे। तब उन्होंने एक नई व्यवस्था अपनाई- जमींदारी की। इस व्यवस्था में राय के एक विशाल-भूभाग पर किसानों से कर वसूली का ठेका दे दिया जाता था। इस ठेके की कीमत राय के कोषागार में पहले ही रखवा ली जाती थी। इसके बाद यह सरदर्द कहो या अधिकार कहो जमींदार के पास आ जाता था कि वह किसान से वसूली कैसे करें। उस वसूली में छूट इत्यादि देने के राजा के अधिकार समाप्त हो जाते थे।

इस प्रकार रयतवारी में किसान से कर वसूली करने वाले राजा के नौकर होते थे। गांव-गांव में उनकी नियुक्ति राय की ओर से होती थी। यह एक विकेंद्रित वसूली-प्रणाली थी। गांव की लगान वसूली में कोई धोखाधड़ी या जोर-जबर्दस्ती हुई तो उसकी व्याप्ति कम होती थी और राय या उसके वरिष्ठ शासक उस पर नियंत्रण रख सकते थे। लेकिन जमींदारी के मार्फत होने वाली वसूली एक केन्द्रित प्रणाली थी जिसमें कई गांवों के अधिकार एक जमींदार के पास सिमट जाते थे। यह जमींदार एक बड़ा पूंजी-निवेशक होता था। वह पहले अपनी पूंजी-निवेश करता था। राजा को ठेके की अर्थात् जमींदारी की कीमत देकर। फिर उसे किसानों से वसूलता था। जाहिर है कि वह लगान में छूट इत्यादि देकर अपना नुकसान नहीं कर सकता था।

मुगल शासकों द्वारा चलाई गई यह जमींदारी प्रथा उत्तरी भारत में बड़े पैमाने पर लागू हुई। लेकिन, दक्षिणी भारत में इसका प्रभाव कम रहा। सत्रहवीं सदी में उभरते हुए मराठी राजा शिवाजी ने अपने राय में पूरी तरह रयतवारी को ही प्रस्थापित किया। शिवाजी के सभी युध्दों में एक महत्वपूर्ण युध्द था सातारा जिले के जावली के जमींदार चन्द्राकांत मोरे के साथ किया गया युध्द। मोरे को औरंगजेब ने जमींदारी के अधिकार बहाल किए थे जिसके बल पर वह किसानों पर अत्याचार कर रहा था।  उसे युध्द में जीत कर और सजा देकर किसानों पर हो रहे अत्याचार को शिवाजी महाराज ने रुकवा दिया इस प्रकार महाराष्ट्र में पूरी तरह रयतवारी ही लागू रही।

जब अंग्रेजों ने शासन प्रणाली अपने हाथ में ली तब उन्होंने न तो जमींदारी प्रथा को छोड़ा और न रयतवारी को। इसी से देश के उत्तरी भाग में जमींदारी प्रथम प्रथा कायम रही जो केन्द्रित का प्रतिनिधित्व करती है। यह समझना होगा कि हमारे देश की मूल परम्परा विकेन्द्रित समाज-व्यवस्था की ही परम्परा है और अब रिटेल के क्षेत्र में विदेशी एफडीआई को 51 प्रतिशत हक- अर्थात् पूरे निर्णायक हक देकर हम एक दूसरे प्रकार की आर्थिक ठेकेदारी का निर्माण कर रहे हैं।

कोई इस भ्रम में न रहे कि जिसे हम फुटकर बिक्री कहते हैं (जो थोक बिक्री से अलग है) वह केन्द्रित कैसे हुई, या ये न कहें कि फुटकर बिक्री तो विकेन्द्रित बिक्री है। यहां बात विकेन्द्रित बिक्री की नहीं, बल्कि केन्द्रीभूत पूंजी-निवेश की है।  जो विदेशी कम्पनियां रिटेल में एफडीआई निवेश करने आएंगी। वह नफा कमाये बिना कैसे रहेगी? उनके एक-एक अत्यंत केन्द्रित सत्तास्थान बन जाना अवश्यंभावी है।
उन्हें भण्डारण में, पैकेजिंग में और सप्लाय चेन के वातानुकूलन में तथा ट्रांसपोर्ट में जो अतिथि खर्च आने वाला है, उसके बावजूद उन्हें नफा कमाना हो तो वे किस प्रकार कमाएंगे। उनका नफा तीन प्रकार से आता है। पहला कारण- सारा बिक्री का माल पैकबंद होने क कारण ग्राहकों की खरीद फटाफट हो जाती है जिससे माल की खपत बढ़ती है। दूसरा कारण उनके पास काम करने वालों पर कम पगार और हायर एण्ड फायर की नीति चलाई जाती है। तीसरा कारण- उनके उत्पादों में अनावश्यक रूप से प्रोसेस्ड फूड और प्रिार्व्हेटिव्ह की बहुलता होती है, जिसकी अतिरिक्त कीमत ग्राहक चुकाता है।

और अब दो मुद्दों की जांच करते हैं जो किसान और खुदरा विक्रेताओं से संबंधित है। किसान के लिए यह कहा जा रहा है कि उसका माल अच्छे दामों में खरीदी जाएगा। लेकिन यह मानना गलत है कि सभी कृषि उत्पादकों को अच्छा मिलेगा। केवल कुछेक खास उत्पादकों को ही अच्छा दाम मिलेगा। मसलन, यदि उन्हें बड़े आकार वाले चमकीले सेव चाहिए तो उतने ही किसानों के सेव लिए जाएंगे जो वैसे हों। यदि वैसे सेव अपने देश में नहीं होते तो वे चीन या ब्राजील से लाकर भी हमारे देश में बेच सकते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक कृषि उत्पाद के लिए एक चलनी लगाकर देखा जाएगा कि किसे लेना है और किसे रिजेक्ट करना है। इस प्रकार के रिजेक्शन के कारण कितना अन्न-धान्य बरबाद होता है उसका हिसाब भी पहले देखना जरूरी है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के सभी किसानों को बढ़ा-चढ़ाकर पैसे मिलेंगे ऐसी बात नहीं होगी।

जो छोटे-छोटे खुदरा विके्रेता हैं, ठेले वाले हैं, पन्सारी की दुकान चलाते हैं, किराना माल विक्रेता हैं, ऐसे करीब पांच छ: करोड़ परिवार, अर्थात् करीब बीस करोड़ लोग आज भी उस रिटेलिंग व्यवस्था पर पलते हैं। ऐसे में यह कहना कितना उचित है कि हर वर्ष एक लाख नौकरियां मिलेंगी। लेकिन हम भी उन बीस-करोड़ को भूल जाते हैं और भारत-निर्माण के विज्ञापनों में एक लाख नौकरियों की बात सुनकर खुश हो जाते हैं।

और फिर आज का रिटेलर एक एण्टरप्राइजिंग व्यक्ति है- वह अपना मालिक आप हैं। उसके पास एक छोटा-सा हुनर है, कौशल है, स्किल है। उसे मिटाकर हम उसे नौकरी करने कहेंगे  वह भी सबको नहीं। तो फिर जो बचे वे क्या करेंगे? चुप रहेंगे या कोई गैर-जिम्मेदार मार्ग चुनेंगे?
वैसे यह सच है कि कोई भी समाज पूरी तरह केन्द्रित या पूरी तरह विकेन्द्रित व्यवस्था पर नहीं चलता है। लेकिन कहां कौन सी व्यवस्था चाहिए इसका निर्णय सोच विचार कर किया जाए या बिना प्लान एकदम धड़ाके से? वह भी जब उस धमाकेदार धड़ाके से विदेशी पूंजी और विदेशी साम्रायवाद को हवा दी जा रही हो।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि हमें कठोर निर्णय लेने पड़ेंगे- यह दर्शाता है कि अब तक चूक करते रहे। समय रहते उन्हें नहीं सुधारा तो क्या गारंटी है कि इस बार भी चूक नहीं कर रहे? और यदि सोच समझकर अपना व्यापार दूसरे को सौंपा जाए तो इससे बुरा और क्या होगा?
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Tuesday, November 13, 2012

रयतवारी आणि रिटेल एफडीआय


रयतवारी आणि रिटेल एफडीआय

Nov 13, 2012, -- मटा

आपल्या देशात हजारो वर्षांपासून राजेशाही आली तेव्हापासून रयतवारीची पद्धत होती. त्याही आधी आपण ज्याला सत्ययुग असे संबोधतो तेव्हा राजेदेखील नव्हते. शेतीचे तंत्र मात्र विकसित होते. अशा वेळी एकेका कुटुंबाकडेच शेतीची मालकी असायची. पण राजेशाही आली आणि राज्यकारभार चालवण्यासाठी धनधान्याची गरज भासू लागली. तेव्हा उत्पादकावर म्हणजेच शेतकऱ्यावर कर बसवण्यात आला. त्या करावर राज्याची मालकी असणार हा समाजनियम होता. अगदी चाणक्याच्या अर्थशास्त्रातही राजाने शेतकऱ्याकडून धान्यरूपाने काय कर घ्यावा दुष्काळ इत्यादी प्रसंगी सवलत कशी आणि किती द्यावी या मुद्यांचा ऊहापोह आहे. या व्यवस्थेत शेतकरी राजाला थेट जबाबदार असे आणि कर गोळा करणारे राज्याचे पगारदार नोकर असत. 

सन १०००पासून पुढे भारतावर जी परकीय आक्रमणे झाली म्हणजे मोगल तुर्क इत्यादींची त्यांनी फक्त इथून संपत्ती लुटून नेण्याचे धोरण न ठेवता इथेच राज्य करण्याचे धोरण ठेवले. त्याही राज्याला कारभार चालवण्यासाठी लागणारा पैसा (कर) हा शेतकऱ्याकडून येणार होता. पण या नव्या परमुलुखातून आलेल्या राजांनी कर गोळा करण्यासाठी नवीन पद्धत आणली. ती होती ठेकेदारीची. त्यांनी जमीनदार या नावाचा एक ठेकेदारवर्ग तयार केला. जमीनदाराला राजाने एखाद्या मोठ्या भूभागाची जमीनदारी द्यायची त्या बदल्यांत त्याने राजाला दरवर्षी एक ठराविक रक्कम अदा करायची. तेवढी केली की त्याने ती रक्कम शेतकऱ्यांकडून वसूल करावी. तो अधिकार त्याचा झाला. मग तो शेतकऱ्यांवर काही जुलूम जबरदस्ती करून हा पैसा वसूल करून घेऊ शकत असे. पूर्वीच्या पद्धतीतम्हणजे जेव्हा वसुली करणारे हे राजाचे पगारदार नोकर असत तेव्हा एखाद्या शेतकऱ्याला किंवा पूर्ण गावाला शेतीकर भरण्यातून सूट देण्याचा अधिकार राजाला होता. पण जमीनदारी पद्धतीत एक ठराविक रक्कम जमीनदाराकडून आधीच वसूल केलेली असल्याने हा हक्क राजाला नव्हता. 

मुस्लिम राजेशाही आणि त्यातली ही जमीनदारीची प्रथा आपल्या महाराष्ट्रात व दक्षिणी राज्यांत कमी प्रमाणात ,तर उत्तर हिंदुस्तानात मात्र पूर्णपणे लागू होती. महाराष्ट्रातील शिवाजी राजांच्या काळातील एक घटना आपल्या सर्वांना नीट ठाऊक आहे. जावळीचे सरंजामदार चंद्रकांत मोरे याला दिल्लीतील मोगल सम्राटाने जमीनदारी बहाल केली होती. शिवाजीराजांनी राज्यांत रयतवारीच लागू राहील असा हुकूम काढूनही जावळीचा जमीनदार मात्र शेतकऱ्यांकडून जबरदस्तीने त्याची जमीनदारी वसूल करत होता. त्याला जिंकून व कठोर शिक्षा देऊन शिवाजीने महाराष्ट्रभर रयतवारीच राहील यावर शिक्कामोर्तब केले. थोडक्यात राज्यात वसुली करणारे राजाचे पगारदार नोकर असतील जमीनदारांप्रमाणे ते वसुली साऱ्याचे मालक नसतील हे पूर्वापार तत्त्व महाराजांनी पुनःस्थापित केले. 

पुढे इंग्रजी अंमल आल्यावरही त्यांनी बंगाल-बिहार-उत्तर प्रदेश इथे जमीनदारीच राहू दिली असली तरी महाराष्ट्रकर्नाटक तामिळनाडू इत्यादी दक्षिणी भागांत रयतवारी पद्धतही राहू दिली. जमीनदारीमुळे शेतसारा वसुलीचा अधिकार एकेका जमीनदाराच्या हातात एकवटला जातो. तर रयतवारी पद्धतीमध्ये तो त्या-त्या गावच्या तलाठी-कुळकर्ण्यांकडे असे आणि त्यामध्ये जुलूम किंवा फसवणूक झाली तरी त्यांची व्याप्ती लहान असे. सर्वसामान्य शेतकरी आपली अडचण राजापुढे मांडू शकत असे. 

थोडक्यात विकेंद्रितप्रणाली आणि केंद्रितप्रणाली असा हा मुद्दा आहे. आजच्या काळात सरकारमध्ये आऊटसोर्सिंग ,कॉण्ट्रॅक्टर पब्लिक-प्रायव्हेट पार्टीसिपेशन हे शब्द परवलीचे झालेत. त्यामध्ये मक्ता किंवा ठेका आणि त्यातून निर्माण झालेली सत्ता हे केंद्रीभूत होतात आणि त्यांच्या विरुद्ध दाद मागणे कठीण जाते. 
रिटेल चेनसाठी एफडीआय गुंतवणूक हा असाच केंद्रीभूत व्यवस्थेचा मुद्दा आहे. कुणी म्हणेल की फुटकळ क्षेत्रातील विक्रीव्यवस्था केंद्रीभूत कशी असेल पण हा प्रश्न चुकतो अहे. एफडीआयमधून ज्या रिटेल चेन्स येणार त्या सर्वांची एक अवाढव्य केंद्रवर्ती सिस्टम असणार. त्यात कोल्ड स्टोरेज असेल पॅकिंगवर भरमसाठ भर असेल. सामानाची अव्याहत वाहतूक असेल इमारतीचे भाडे असेल. या सर्वांसाठी पैसा लागतोच. गुंतवणूकही लागते. तरीही मोठ्या रिटेल चेन्स नफ्यात कशा चालतात तर दोन कारणांनी. एक तर त्यांच्याकडे मोठ्या संख्येने ग्राहक खेचला जातो. पाकिटबंद उत्पादनांमुळे ग्राहकाच्या खरेद्या पटापट होतात. दुसरे कारण मोठे आहे. त्यांच्याकडील माणसे कमी किमतीत राबवून घेतली जातात. त्यांच्यावर सतत हायर अॅण्ड फायरची टांगती तलवार असते. आणि ते मूळ उत्पादकाला चांगला भाव देणार असे म्हणत असले तरी सर्वच उत्पादकांना तसा भाव मिळत नाही. फक्त ठराविक पद्धतीच्याच उत्पादकांना भाव मिळतो. उदाहरणार्थ तुमची सफरचंद चकचकीत नसतील तर चीन किंवा ब्राझीलमधून चकचकीत सफरचंद आणली जातील. तुमच्या मालाला एक ठराविक चाळणी लावली जाईल. त्यामुळे भरघोस बाजारपेठ मिळेल असे नाही. शिवाय खासगीरीत्या जे छोटे रिटेलिंग करणारे असतात त्यांना नोकऱ्या तर नाहीच नाहीत. आज १४-१५ कोटी रिटेलर असताना दरवर्षी एक लाख नोकऱ्या निर्माण करू हे सांगणे किती चूक आहे! पण एक लाख नोकऱ्या पहा भारत निर्माण हे स्लोगन ऐकताना आपल्याला त्या १५ कोटींची आठवण राहात नाही आणि आपण म्हणतो खरंच की किती नोकऱ्या! 

आजचे रिटेलर स्वतःपुरते मालक आहेत. ते या नवीन रिटेल चेनच्या मालकरूपी जमीनदारांचे नोकर होणार. केंद्रीभूत सत्ता केंद्रीभूत व्यापार यांची नांदी होणार आणि विकेंद्रीत व्यापार करू पाहणारे त्यांचे छोटेसे स्किल व एण्टरप्राइज कमी पडले म्हणून रोजीरोटी हरवून बसणार. मग ते स्वस्थ बसणार की इतर मार्ग चोखाळणारकिंवा तसं पाहिलं तर समाजरचना पूर्ण केंद्रीकृत विक्रेंद्रित कधीच असू शकत नाही. पण जे काही करायचं ते नीट नियोजनपूर्वक करायचं की धाडकन आणि त्या धाडकन करण्याच्या धाडसी निर्णयाने विदेशी व सत्तेचे फावत असेल तर यापेक्षा देशासाठी वाईट ते काय 

लीना मेहेंदळे
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From Raju Gandhi <rajugandhi07@gmail.com>
To: Leena Mehandale <leena.mehandale@gmail.com>
Cc: Sunil Kulkarni <kulkarnipsunil@gmail.com>
Tue, 13 Nov 2012

Congratulations for the well drafted,well studied thoughts shared in the
above article.
The last para is very conclusive & fore casted perfectly.

We are accepting the FDI due to pressure from the other countries & the
decision will not be in favour of our country protecting our national
interest.

FDI will never increase majority of the farmers take home all the times.
It's illusion that the wastage Will be reduced & bargaining power of the
farmers will increase.
No of the Small middlemen may decrease but the share & percentage towards
the handling,processing,warehousing,packing,             cold chain charges
ets will increase.The heads of the expenses & the beneficiaries will be the
different.
Though not needed will be forced to consume processed,preserved,caned
expensive not required,not preferable,not desirable us.
Since our farming  & the production is fragmented, in the long term our
farmers will be at the mercy of the buy rs since other marketing channels
will not remain much viable.Gradually % of the imports will Ingres since
due to various reasons it will be attractive in looks only
cheaper, & much needed by the exporting countries.

By inviting FDI knowingly/ unknowingly future of  most impotent & very
precious enterprunuel skill obtained by these 15 Crs retailers pushing in
to the dark.
The retailers are around 12% of our population so we have to take very
conscious decision.
Instead of encouraging the import of capital/technology/know how/consultant
 our thrust should be on exporting the things like past.
We were richest country  in the world when we are selling our
products,services in the world over.
Recently in the last decade it is proved once again by the Software
Industry.
It is a systematic plan to earn continuously & increasingly from our
country by creating the necessary,nonrecurring things.
We can look back for the last 50 years very carefully in the cultivation
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