Saturday, June 05, 2021

हिंदू धर्म में संन्यास - महानगर 3 मई 1995

 

हिंदू धर्म में संन्यास (महानगर बुधवार 3 मई

1995)

पश्चिमी दुनियामें बहु-चर्चित जितनी भी आधुनिक मैनेजमेंट टेकनिककी किताबें हैं, उन सबमें एक सूत्र समान है, वह यह कि किसी उद्योग या व्यवसायमें सफल होनेके लिए मनुष्यका महत्वाकांक्षी होना आवश्यक है यही सूत्र वहांके वरिष्ठ प्रशासकीय अधिकारियों पर भी लागू किया जाता है और कई बार भारतीय अधिकारी भी इस सूत्र से प्रभावित हो ही जाते हैं। इसके बावजूद भारतीय प्रशासनमें कई ऐसे अधिकारी पाये जाते हैं जो अपनी कर्तव्यदक्षता, ईमानदारी और काममें अच्छा अंजाम देनेवाले हैं, जनसामान्यके प्रश्नोंके प्रति संवेदनशील हैं पर फिर भी उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं कहा जा सकता। वे अपना काम अच्छी तरह निभा लेनेमें ही अपनी महानता समझते हैं और इस बातकी परवाह नहीं करते कि उन्हें अच्छा पद दिया जा रहा है या नहीं। थोडे शब्दोंमें कहा जाय तो उनके लिए उचित शब्द होगा अलमस्त या फक्कङ। इसीलिए एक दिन हमारी चर्चा मंडलीमें यह चर्चा चली कि हमारा आदर्श कौन है? एक अफसर जो बडा ही एफिशंट और बडा ही महत्वकांक्षी है, या वह जो कामका तो पक्का है लेकिन अपनी अलमस्तीमें खुश है, संतुष्ट है। अब यह भी तय है कि ऐसा प्रश्न किसी पश्चिमा चर्चा मंडलीमें तो उठेगा ही नहीं क्योंकि पश्चिमि सोसायटीमें महत्वाकांक्षी न होना अपने आपमें ही एक कमी या कमजोरी मानी जायेगी। लेकिन भारतीय संस्कृतिने संतोषको एक कमजोरी नहीं वरन गुण कहकर जाना है। जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान। अतः सवाल उठा कि क्या यह संतोषकी मानसिकता आजके युगमें भी कोई मायने रखती है, क्या यह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्थामें खतरनाक हो सकती है? वहांसे फिर बात आयी धर्म पर और संन्यास पर.

हिंदू फिलोसफीमें चार पुरूषार्थ बताये गये हैं- वे भी एक नियम, एक क्रमसे। पहले मनुष्य धर्म नामक पुरूषार्थको हासिल करें, फिर अर्थको, फिर कामको और फिर मोक्षको। यहां अर्थ शब्दके माने है संपत्ति या संपन्नता- लेकिन वही संपत्ति जो धर्मका आचरण करते हुए मिली हो - अर्थात अपने श्रम, कार्य कुशलता और उत्पादकताके कारण मिली हो न कि चोरी, डकैती, छल- कपट, घूसखोरी या जुएबाजी से। तीसरा पुरूषार्थ है काम- या उपभोग अर्थात् जो धन कमाया है उसका उपभोग या योग्य कार्यमें उस धनका विनियोग करना यह योग्य उपभोग इसलिए आवश्यक है कि इससे जीवनमें एक प्रकारकी स्थिरता, सुरक्षितता आती है और ऐसा वातावरण तैयार होता है जिसमें स्वयंका ज्ञान और कला सुचारू ढंगसे पनप सकते हैं - बढ सकते हैं। साथ ही योग्य उपभोगको प्रश्रय देनेपर उन कलाकारों और कारीगरोंकी कलाको भी प्रश्रय मिलता है जिनकी आजीविका उसपर निर्भर है।

इन पुरूषार्थोंको जो हासिल कर लेता है- वही अगली सीढी अर्थात मोक्षके चौखट तक पहुंच सकता है और वहां पहुंचना हरेकके लिए वांछनीय बताया गया है। वहांसे अंदर जानेका उपाय बताया है संन्यास ग्रहण लेकिन संन्यासका अधिकार भी हर व्यक्तिको उपलब्ध नहीं है मनुष्य पहले ब्रह्मचर्य आश्रमका पालन करते हुए ज्ञान अर्जन करे- पढाई करे। फिर गृहस्थ आश्रमका पालन करते हुए अपनी कार्यकुशलतासे धन अर्जन करे। साथ ही धर्मका पालन भी करता रहे जिसकी रीति उसे ब्रहमचर्य आश्रममें सिखायी गयी है दोनों आश्रमोंके लिए पच्चीस- पच्चीस वर्षका काल उपयोगी बताया है इसी कालमें मनुष्य अपने धनका उपभोग भी करे- उसके माध्यमसे अपनी परिवारकी वृद्धि औ समृद्धी भी करे

फिर वह वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करे अर्थात् जिस व्यवसायको उसने गृहस्थ आश्रमके दौरान चलाया या बढाया- उसकी जिम्मेदारी बच्चोंको, नयी पीढीको सौंप दे, नयी पीढीको जिम्मेदारी उठानेके लिए सक्षम करे इस दौरान वह नयी पीढीके लिए दूरसे पथ- प्रदर्शकका काम करता रहे. कभी- कभार सलाह मशविरा दे दे यदि संभव हो तो स्वयं वनमें जाकर रहेसंकटकाल हो तो वापस आकर मदद करे लेकिन रोजाना कामकाजकी जिम्मेदारी और अधिकार दोनों ही नयी पीढीपर सौंप दे यदि संभव हो तो स्वयं वनमें जाकर रहे इसीलिए आयुकी इस अवस्थाका नाम है वानप्रस्थ आश्रम- अर्थात् वनकी ओर, प्रकृतिकी ओर,प्रस्थान करनेकी अवस्थावहां वनमें वह अपनी जरूरतोंको कमसे कम करता रहे साथ ही कुछ और ज्ञानार्जन भी करता रहे

इन सारे अनुभवोंसे गुजरने के बाद यदि वह अपने आपको योग्य और सक्षम समझे तो फिर किसी योग्य गुरूके परामर्शसे संन्यास आश्रमकी दीक्षा ले

इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रहमचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमका विधान तो सबके लिए बताया गया है लेकिन संन्यास आश्रमका विधान सबके लिए नहीं है - यह केवल सुयोग्य और दृढ व्यक्तियोंके लिए है

यह इसलिए कि हिंदू दर्शनके अनुसार संन्यासीपर बडी जिम्मेदारी है समाजको रास्ता दिखाने की संन्यास लेने वाला मनुष्य अपना पहला नाम या परिवारके साथ जुडी हुई अपनी पहचानको छोड देता है फिर वह न किसीका पिता है न पुत्र, न किसीकी माता है ना बहन ना पत्नी इसका प्रतीक है मुंडन यहां उसका व्यक्तिगत जीवन समाप्त हो जाता है और सामाजिक जीवन प्रांरभ हो जाता है फिर वह केवल समाजके लिए ही जीता है- वह भी समाजसे न्यूनतम दानको स्वीकार करते हुए।

संन्यासीके लिए भिक्षाका विधान है- ताकि उसे हर पल यह भान रहे कि वह समाजके दातृत्व पर जी रहा है और इस दानको उसे चुकाना भी है बदलेमें समाजको ज्ञानदान देकर और सही रास्ता समझाकर उसके लिए विधान है कि वह पांचसे अधिक घरोंमें भिक्षा न मांगे जूठा या बासी अन्न भिक्षामें स्वीकार न करे इस नियममें कभी भूखा रहना पडे तो रह ले एक गांवमें तीन दिनसे अधिक दिनों तक न रहे केसरिया वस्त्र धारण करे और अपने सामानमें केवल एक कमंडल रखे यह कमंडल या तूंबा जंगली लाल कद्दूका बना होता है जिसमें दो खाने बने रहते हैं निचले खानेमें वह अपने लिए दूसरी जोडी वस्त्र रख सकता है ऊपरके खानेमें भिक्षाका अन्न, या पानी इसके सिवा वह और कुछ संग्रह नहीं कर सकता है

संन्यासी केसरिया रंगका वस्त्र ही धारणा कर सकता है इसका कारण है कि केसरिया रंगको त्याग, तपस्या, उत्सर्ग, बलिदान, वीरता, ज्ञान और संतोषका रंग माना गया है मानस शास्त्रमें रंगोंका मनपर पडने वाला प्रभाव जिस किसीने पढा होगा या प्रयोग किये होंगे वही बता सकता है कि केसरिया रंग इन गुणोंके साथ कैसे जुड गया भारतमें जो सब कुछ त्यागकर संन्यासी बन गया हो वह केसरिया वस्त्र पहनता है या फिर जो वीरमरणके लिए सारे मोहको त्याग चुका है वह केसरिया वस्त्र पहनता है साथ ही जो लंबी तीर्थयात्रा पर जा रहा है वह केसरिया पताका लिए चलता है क्योंकि केसरिया रंग सांसारिक मोहसे लग हटनेका प्रतीक तो है, लेकिन समाजसे दूर हटनेका प्रतीक नहीं हैं, बल्कि अपने आपको समाजके लिए उपलब्ध और उत्सर्ग करनेका प्रतीक है। यह तभी संभव है जब मनुष्यके पास संतोष हो एक संन्यासी संसारको तभी लीडरशीप दे सकता है यदि वह ज्ञानी हो, अपने काममें कार्यकुशल और प्रवीण रह चुका हो, जिसने अपने ज्ञानको खूब घिसकर और तपाकर सोनेकी तरह खरा कर लिया हो अब ऐसे संन्यासीको देखकर कोई आलसी आदमी सोच सकता है कि मैं भी केसरिया वस्त्र पहनकर भिक्षा मांगता चलूं तो बिना काम किये ही मेरा पेट भर सकता है लेकिन केवल केसरिया वस्त्र पहनकर एक आलसी आदमी एक ज्ञानी संन्यासीके समकक्ष नहीं हो सकता है

यही अंतर है संतोष या अलमस्तीके प्रसंगमें भीएक निखटटू और औसत काम करेवाला अफसर भी कहा सकता है कि भई मैं तो खुश हूं, संतुष्ट हूं, मुझे कोई ज्यादा काम नहीं करना पडता है और ज्यादा सिर भी नहीं खपाना पडता है पर उसकी संतुष्टि उसके आलसके कारण उपजी है और वह संतुष्टि किसी गुणका प्रतिक नही है उससे वह अफसर भला जो महत्वाकांक्षी है और अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करनेके लिए मेहनत और अच्छा काम करने को तत्पर है लेकीन उससे भी अच्छा वह अधिकारी है जो कर्तव्यतत्पर होते हुए भी अपने आपमें संतुष्ट है, परिपूर्ण है, अलमस्त है, इस या उस पोस्टके पीछे नहीं दौडता क्योंकी वह जानता है कि उसका बडप्पन उसक पोस्टपर निर्भर नहीं है वह तो उसका अपना अंदरूनी बडप्पन है क्योंकी अपना काम बेहतरसे बेहतर कर दिखानेकी धन उसकी खुदकी है एक बेहतर कामको कर निभानेका आनंद और उससे उपजी संतुष्टि उसके पास है

बेहतर कामसे एक अलग तरहका अहंकार भी उपज सकता है जो कार्यकुशलता के लिए घातक भी हो सकता है यह अंहकार भी महत्वाकांक्षाका दूसरा रूप है.लेकिन महत्वाकांक्षा और अहंकारसे ऊपर उठकर जिसने कार्यकुशलताके साथ संतोषकी अवस्था प्राप्त की है उसकी अवस्था उस ज्ञानी- संन्यासी जैसी है इस प्रकार हम देखते हैं कि सच्चा संतोष और आनंद तो कार्यकुशलताके कारण ही उपज सकता है लेकिन मूढ व्यक्ति अपने आलसको ही अपनी अलमस्ती बतायेगा, उसे संतोषका नाम देगा आलसमें और कार्यकुशलतासे उत्पन्न होने वाले संतोषमें फर्क कर सकें यह समझ मूढ व्यक्तिमें नही होगी परन्तु हमारे अंदर होनी चाहिए

और धर्म भी क्या है? धारयति इति धर्मः जो हमें अपने आपको धारण करनेकी, अर्थात् अपन आंतरिक दृढताको और साथ ही समाजकी आंतरिक समन्वयको बनाये रखनेकी सामर्थ्य देता है- वही धर्म है वह धर्म कार्यकुशलताके बगैर भी नहीं आता लेकिन संतोषके बगैर भी नहीं आता

कार्यकुशल व्यक्तिका महत्वाकांक्षी होना स्वाभाविक है पश्चिमी मैंनेजमेंट गुरू आज चीख चीखकर कहते हैं महत्वाकांक्षी बनो- क्योंकि महत्वाकांक्षा पूरी करनेके लिए ही सही- व्यक्तिको अपने काममें कुशलता लानी पडती है। लेकिन कार्यकुशलता और महत्वाकांक्षाके बाद तीसरी सीढी है संतोष जिसके बगैरे व्यक्ति या समाजका आंतरिक समन्वय अधिक दिन तक नहीं टिकेगा। इसीलीए चाहिए संन्यासी वृत्ति भी यहीं भारतीय मानसिकता पश्चिमी मैनेजमेंटसे अलग हो जाती है









Monday, February 08, 2021

नोटाबंदी आणि राहूल न्याय -- 29।03।2019

 नोटाबंदी आणि राहूल न्याय 

नोटाबंदी आणि राहुलन्याय (29।032019) - (फेसबुकवर देखील आहे)

पंतप्रधान या पदावरून निर्णय घेत नरेंद्र मोदींनी २०१६ मधे नोटाबंदी आणली. त्याची सर्वात मोठी झळ कांग्रेसला पोचली. पण तीच जणू कांही देशातील गरीबीस कारणीभूत आहे. असे भासवून राहूल गांधींनी निवडणूकीच्या तोंडावर प्रत्येक गरीबाला सरसकट वर्षाला ७२००० रू. देण्याची घोषणा केली आहे. मुळात अशा घोषणेने आचार संहितेचा भंग होतो कां? कारण ही थेट लाच दाखवली आहे.

नोटाबंदीमुळे झालेला अन्याय धूवून काढण्यासाठी आम्हीं फुकटात बहात्तर हजार ही योजना आणत आहोत असे राहूलबाबाचे सूत्र आहे. हे पैसे कुठून आणणार याचे उत्तर देताना त्याने सांगितले काळजी करू नका, देशात खूप पैसा आहे आणि तो सर्व धनिक वर्गाच्या खिशात जाऊन बसलेला आहे. त्यामुळे या न्याय योजनेसाठी पैसा कमी पडणार नाही.

पण धनिक वर्गाच्या खिशातून हा पैसा नेमका कशा प्रकारे बाहेर काढणार. हे मात्र राहूलबाबाने सांगितले नाही.

या योजनेला न्याय असे नावं देऊन राहूलने हा शब्दच हास्यास्पद करून टाकलेला आहे. भारतीय समाजात आधीचे बोकाळलेल्या भ्रष्टाचार या दुर्गुणाबरोबरच आळस या दुर्गुणाला खतपाणी घालण्यासाठी ही योजना आहे पण संख्येपुढे शहाणपण चालत नाही याची जाणीव ठेऊन आणि त्याचा फायदा उचलत ही योजना जाहीर झालेली आहे असेच म्हणावे लागेल.

अगोदर नोटाबंदीच्या निर्णयाने कांय कांय इष्ट किंवा अनिष्ट झाले ते आधी पाहू या. नोटाबंदीचा तत्काळ सर्वाधिक फायदा झाला तो आतंकवाद्यांना पुरवठा केला जाणारा रोख पैसा चलनातून बाद झाल्यामुळे, तसेच देशात लक्षावधी रूपयांच्या नकली नोटा पाकीस्तान, नेपाळ व बांग्लादेशच्या रस्त्याने पाठवलेल्या जात असत. त्या नकली नोटांवर तत्काळ आळा बसला.

पाचशे व हजाराच्या त्या काळी चलनात असलेल्या नोटा बाद करताना लोकांच्या हातात अन्य पर्याय ठेवणे भाग होते. निव्वळ शंभराच्या नोटा हा पर्याय होऊ शकला नसता. त्यासाठी नवीन नोटा चलनात आणणे गरजेचे होते. त्याही अगोदर त्या छापून घेतल्या जातील व त्यांचा पुरवठा वेगाने होऊ शकेल हे निश्चित करणे गरजेचे होते. त्यासाछी नव्या नोटा छापून तांना शक्यतो कोणालाही अंतस्थ कारणाची कल्पना येऊ नये हे ही महत्वाचे होते. नव्याने दोन हजाराच्या नोटा चलनात आल्या. त्यांचे डिझाइन नक्की करणे, त्या छापून घेणे, रिझर्व्ह बँकेत त्यांची नोंद घेणे या सारख्या गोष्टी एका रात्रीत करता येत नाहीत. त्याची पूर्वतयारी कांही काळ अगोदरच सुरू झाली होती हे नक्की. ते करताना नेमके कांय व कशासाठी होत आहे हे कमीत कमी लोकांपर्यत उघड व्हावे या दृष्टीने पाचशे व हजारांच्या नोटांच्या जागी कांहीतरी नवे म्हणजेच दोन हजाराच्या (व नंतर खूप पुढे दोनशेच्या) नोटा तयार करण्यांत आल्या. यावरून या योजनेच्या गुप्तेची किती काळजी घेतली होती हे लक्षांत येते. इतक्या गुप्तपणे एखादी योजना राबवता येणे हेच मुळात एक मोठे सामर्थ्य असते. ते करताना सर्वच्या सर्व अडचणी आधीच सोडवता येतील हा विचारही चुकीचा आहे.

नोटाबंदीमुळे नकली नोटा अनंत काळापर्यंत थोपवता येतात का याचे उत्तर अर्थातच नाही हे कुणीही सामान्य माणूसही सांगेल. पण त्या कांही काळ नक्कीच थांबतात व हा काळ अगदी तीन- चार महिने इतका लहान असला तरी नकली नोटा फिरवणारे नेटवर्क बंद पडायला एवढा काळ पुरेसा असतो. पुढे जेंव्हा कधी नव्याने नकली नोटा छापून निघतात तेंव्हाही त्यांचे वितरण होण्यासाठी आवश्यक ते नेटवर्क सहजासहजी उभे रहात नाही हा मोठा फायदा देशाचा होतो. या बाबत कुणा अर्थतज्ज्ञाने सरकारची पाठ थोपटलेली दिसत नाही.

आतंकवाद्यांना फंडिग करण्यासाठी घरामध्ये लपवून ठेवलेली अब्जावधी रूपयांची कॅश नोटाबंदीमुळे क्षणार्धात निष्प्रभ झाली. त्यामुळे रर फंडिगचे नेटवर्क जे मोडले त्याचा सुपरिणाम देशाने गेल्या चार वर्षात सातत्याने पाहिला. युपीएच्या दहा वर्षाच्या राजवटीत देशातील एकही असे मोठे शहर नव्हते जिथे लोकांना कधीतरी ब्लास्ट होईल अशी भिती वाटत नसेल. मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, गुवाहाटी, कोलकाता, हैद्राबाद व दिल्ली अशा सर्व शहरांनी म्बस्फोटाचा तडाखा भोगला होता व पुढे कधी कांय होईल याची अजिबात गॅरंटी देता येत नव्हती . असहिष्णुतेबद्दल अश्रु ढळणा-या नसिरूउद्दीन शहाच्याच A Wednesday या चित्रपटात त्याचाच डायलॉग आहे -- घरसे बाहर निकलता हूँ तो बीबी सौ बार फोन करती है - चाय पी या नही, खाना खाया कि नही. असलमें वह जानना चाहती है कि मैं जिन्दा हूँ कि नहीं।

आतकंवाद्यांनी निर्माण केलेली ही दहशत हेच यूपीएच्या काळातील देशाचे वास्तव होते, पण नोटाबंदीमुळे ते दहशतीचे वातावरण एकदम निवळले हा फरक मेगासिटीमध्ये रहाणाऱ्या बुद्धीजीवींना कळू नये व त्यांनी यासाठी कृतज्ञता बाळगू नये याची कींव करावीशी वाटते. त्यांना कसाब आणि कंपनीच्या हाती रोज मरण किंवा मरणाची दहशत हेच अधिक हवेहवेसे होते का याची चर्चा नक्की केली गेली पाहिजे.

दूरगामी फायद्यांच्या विचार करता नोटाबंदीचा मोठा फायदा म्हणजे उत्तरप्रदेशातील निवडणुकीत भाजपाचा दणदणीत विजय, कारण या विजयामुळेच सरकार काश्मीरमध्ये कडक धोरण आणू शकते. उत्तर प्रदेशातील यंत्रणेची साथ नसेल तर केंद्र सरकार काश्मीरमधे मनासारखे धोरण राबवू शकत नाही.

काश्मीरातील आतंकवाद्यांना हातपाय पसरण्यासाठी सुरक्षित व जवळचे राज्य म्हणजे उत्तर प्रदेश. त्यामुळे तेथील यंत्रणा गाफिल राहून चालणार नसते. म्हणूनच मला खात्रीने सांगावेसे वाटते कीगेल्या दोन वर्षात काश्मीरमधे जे काही खंबीर धोरण केंद्रशासन राबवू शकले त्यामागे उत्तर प्रदेशातील भाजपा शासनाचा फार मोठा वाटा आहे. आपण हे विसरता कामा नये की कश्मीर मधील आतंकवाद क्षणार्धात आपल्यापर्यंत पोहोचू शकतो. २६।११ च्या हल्लयाने हेच दाखवून दिले व आताही NIA ने दिल्ली परिसरात पकडलेले आतंकवादी हेच दाखवून देत आहेत. म्हणूनच कश्मीरातील घडणाऱ्या घटनांबाबत आता आपण अकर्मण्य राहून किंवा मला कांय त्याचे हा विचार करून चालणार नाही.

नोटाबंदी विरूद्ध कांग्रेसने तर तडफड व्यक्त केलीच कारण घरांत कोटयावधी रूपयांची बंडले लपवून ठेवण्याची मोठी सवय त्यांना व प्रशासनातील भ्रष्ट अधिकाऱ्यांना सर्वांत अधिक प्रमाणात लागली होती. पण ज्यांना झळ पोचली नाही अशा कांही बुद्धीवादी व समाजात उच्चभ्र म्हणवणाऱ्यांनी देखील नैतिक कारण देत नोटाबंदीची निंदा केली होती. ते नैतिक कारण म्हणजे नोटाबंदीने श्रीमंताविरूद्ध असलेल्या गरीबांच्या मनातील द्वेषाला व ईष्येला खतपाणी मिळाले. या आरोपाइतका मोठा अविचार दुसरा असेल असे मला वाटत नाही. ही ईष्या निव्वळ गरीब विरूद्ध श्रीमंत अशी नव्हती किंबहुना ती कधीच तशी नसते हे त्यांनी आधी समजून घेतले पाहिजे.

असे मी का म्हणते हे समजून घेऊ या. प्रामाणिकपणामुळे गरीबी किंवा मध्यवर्गात पडून राहिलेल्या जनांच्या मनांत श्रीमंतांविरुद्ध सरसकट राग कधीच नसतो. भारतियांना हे बाळकडूच असते की तुम्ही श्रमाने मिळवलेली कष्टाची भाकर तुम्ही खा, इतरांच्या तूपपोळीवर आक्षेप घेऊ नका- कारण तो त्याने त्याच्या श्रमातून मिळवला आहे. पण अप्रमाणिकपणाने व भष्टाचाराने गडगं श्रीमंत झालेल्यांबाबत सर्वांच्या मनात रोष असणारच. तात्पर्य या बुद्धिवाद्यांना प्रामाणिक गरीबांना अप्रामाणिक श्रीमंतांबद्दल असलेला रोष असे एक वेगळे वर्गीकरण समजलेले नाही असे मी म्हणेन. माझ्या प्रशासकीय जीवनात गैरमार्गाने पैसा मिळवणारे कित्येक उच्च अधिकारी दृष्टीस पडत. त्यांच्या विरूद्ध प्रत्यक्ष केस होणे, त्यांचा गुन्हा सिद्ध होणे या गोष्टी वाटतात तेवढया सोप्या नसतात. अगदी अतुंलेंचे सिमेंट भ्रष्टाचाराबाबतचे कादपत्र बघून जस्टिस लेंटिनने आय अम शॉक्ड असे उद्गार काढले होते तरीही या घटनेच्या पुढील अठरा– वीस वर्षां एकेका पुराव्याच्या फाइली गहाळ होत जाऊन शेवटी सर्वोच्च न्यायलयात त्यांची निर्दो सुटका झालीच होती. अशा अप्रामाणिक अति श्रीमंताविरूद्ध प्रामाणिकपणा राखल्याने तुलनेने गरीब असणाऱ्यांनी द्वेष किंवा असमर्थन का ठेऊ नये.

तेंव्हा नोटाबंदीमुळे अशा अप्रामाणिक लोकांचा मोठा तोटा झाल्याचे पाहून ज्या प्रामाणिक लोकांनी नोटाबंदीचे समर्थन केले त्यांची जाण व त्यामागचे तत्वज्ञान राहूलबाबाला कळू शकत नाही. म्हणूनच आता तो तद्दन चुकीची गरीबी विरूद्ध श्रीमंत अशी वर्गवारी करत आहे. ते करताना तो नैतिकतेच्या संकल्पनांना सर्वथा फाटे फोडत आहे. वाईट म्हणजे काही बुद्धिजीवीही या चुकीच्या वर्गवारीला बळी पडत आहेत.

देशातील वीस टक्के गरीबांना सरसकट दरमहा सहा हजार रूपये अव्याहतपणे वाटण्याची राहूलची घोषणा आहे. त्यातही एक मेख आहे. जर एखाद्या गरीबाचे मासिक उत्पन्न आज घटकेला चार हजार असेल तर राहूल योजनेत त्याला दरमहा दोन हजारच मिळणार. मग त्याने आज होत असणारी चार हजार रूपये किंमतीची मेहनतका करायची? त्यापेक्षा मी कामच करू शकत नाही व कांहीच कमवू शकत नाही हे म्हणणे कितीतरी सोपे. म्हणजेच देशातील उत्पादकता, श्रमसाध्यता, मेहनतीचींच कमाई खावी असे म्हणणाऱ्यांचा प्रामाणिकता हे सर्व शून्यावर नेऊन ठेवणारी योजना! आणि याला न्याय म्हणण्याइतका मुर्खपणा नव्हे दुटप्पीपणा राहूलबाबा मधे नक्कीच आहे. त्याला न्याय, श्रम, प्रामाणिकपणा स्वश्रमातुन अर्थार्जन यासारख्या शब्दावलीचा अर्थही कळत नाही,, हे दुर्दैव. परंतु अशा शब्दांना चुकीचा अर्थ चिकटवून व बिनमेहनतीच्या मासिक सहा हजार रूपयांची लालूच दाखवून अवाढव्य जनमत स्वतःकडे वळविण्याच्या प्रयत्नात आपण या देशात केवढी मोठी दुष्प्रवृत्ति निर्माण करतो आहे हे जर त्याला कळल असेल तर त्याच्या सारख दुष्टबुद्धि तोच.

मला सिंघम सिनेमातील एक संवाद आठवतो – जानता है ये कौन है? ये छोटू है। लोगोंको चाय पिलानेका काम करता है और चार पैसे कमाता है। और तू कौन है? बिन मेहनत किये नेताकी रोटी तोडनेवाला ।

देशाकडे भरपूर पैसा आहे हे नक्कीच! तो कमवणारे कोटयावधी लोक प्रामाणिक तर इतर कोटयावधी अप्रामाणिक आहेत. त्यांचा पैसा काढून गरीबांमधे वाटणार असे राहूलबाबा रॉबिनहुडच्या थाटात सांगत आहे. मग तो कोणाचा पैसा काढणार आहे - प्रामाणिकांचा की अप्रामाणिकांचा?

पण सर्वात आधी त्याने हे सांगावे की त्याच्याकडे कोटी रुपयांची संपत्ति आहे. वर्षाला बहात्तर हजार रूपयेही न मिळवू शकणाऱ्यांच्या मानाने तो गडंगंज श्रीमंत आहे. मग ही संपत्ति तो कोणत्या मार्गाने बाहेर काढणार आहे?

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Friday, January 08, 2021

कशी झाली विकासाची वाटचाल --- विमर्श त्रैमासिकाचा २०११ दिवाळी अंक -- पूर्ण

कशी झाली विकासाची वाटचाल विमर्श त्रैमासिकाचा २०११ दिवाळी अंक

कशी झाली विकासाची वाटचाल

देशाला स्वातंत्र्य मिळून ६४ वर्षे झाली. यंग डेमोक्रसी असा शब्द दोन अर्थांनी वापरला जातो. लोकशाही म्हणून ही ६४ वर्ष एखाद्या राष्ट्राच्या इतिहासात फार नसतात हा एक अर्थ. आणि आपल्या जनसंख्येचे वयोमानाप्रमाणे विश्लेषण केले तर “यंग” वयोगटांतील जनसंख्या खूप मोठी आहे हा दुसरा अर्थ. या “यंग” लोकांसाठी देशातील विकासाच्या वाटचालीची उजळणी करायला हरकत नाही.

या वाटचालीचे तीन स्पष्ट टप्पे पडलेले दिसतात. १९७५ पर्यंतचा पहिला टप्पा, २००० पर्यंतचा दुसरा टप्पा आणि पुढचा तिसरा टप्पा ज्यात आपण चाललो आहोत.

माझा जन्म १९५० मधे झाला. त्यामुळे पहिल्या टप्प्यांत घडलेल्या कित्येक गोष्टी माझ्या आयुष्याच्या समांतरच घडत होत्या. किंवा अस म्हणू या की मला त्यांची जाणीव होत होतच माझेही आयुष्य पुढे सरकत होते.

स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतरची पहिली भलीमोठी उपलब्धी कोणती अस मला विचारल तर आपली राज्यघटना लिहिली जाणे आणि २६ जानेवारी १९५० ला तिची राज्यमान्यता होणे ही मला अति महत्वाची गोष्ट वाटते. पहिल्या निवडणुकीच्या वेळी मी लहान होते पण आई वडील मला बरोबर घेऊन गेले होते आणि प्रिसायडिंग ऑफिसरने मला आत जायला परवानगी देताना उच्चारलेले शब्द आई अजून सांगते - हो, हो नवीन पिढीला सुद्धा कळू दे लोकशाही काय असते. तेंव्हापासून मतदानाचा हक्क म्हणजे काही तरी फार प्रभावी गोष्ट हे माझ्या मनावर बिंबले.

माझ्या शाळेच्या पुस्तकांमधे “दि गुड अँड दी ग्रेट” या नावाचे पुस्तक असून त्यांत चार महापुरूषांची चरित्र होती. महात्मा गांधी, डॉ राजेद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू आणि डॉ बाबासाहेब आंबेडकर. एकेका शब्दात त्यांचा विचार मांडायचा तर अनुक्रमे ग्राम-स्वावलंबन, देश-गौरव-जतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोन आणि समन्यायी व्यवस्था असे त्यांच्या विचारंच्याबाबत सांगता येईल. त्या दिशेने चाललेले प्रयत्न आसपास होताना दिसत होते.

राज्य घटनेनुरूप आपण जाति-जातितील विषमता दूर करण्याचा विडा उचलला. घरांत, शाळेत, समाजात या तत्वाचा पुरस्कार सुरू होता. जे नाक मुरडत होते त्यांच्याबद्दल चांगले बोलले जात नसे. सामाजिक न्यायासाठी आरक्षण मागे पडलेल्यांना पुढे घेत चालणे हे तत्वज्ञान, मला पटले आणि मला वाटते की याने आरंभीच्या काळात देशात नवीन क्षमता शक्यता निर्माण केल्या आहेत.

१९६० मधे महाराष्ट्र राज्याची निर्मिती झाली यातून मराठी भाषेचा विकास होईल कारण ती राज्यशासनाची भाषा होईल असे मला सांगण्यांत आले. मी त्यावेळी बिहारमध्ये होते. खरेच तिथल्या शाळांमधे हिंदी सोबत इतर तीन “आधुनिक भारतीय भाषा” शिकविण्याची सोय होती, त्या म्हणजे मैथिली, बंगाली नेपाली. या भाषांतून परीक्षा देण्याची सोय होती पुस्तके पण होती. शिवाय हिंदी, संस्कृत इंग्लिश होत्याच. मला आठवत, माझ्या हेडमास्तरांनी म्हणजे श्री सहाय सरांनी आमच्या घरी येऊन मला ऊर्दू, अरेबिक, फारसी असे लँग्वेज पॅकेज घेण्याचा आग्रह वडिलांकडे केला होता. हिंदी संस्कृत काय तुला कधीही येईल अस ते मला म्हणत असत. सांप्रदायिक सलोख्यासाठी हा आग्रह होता. मला संस्कृतात मिळणाऱ्या पैकीच्या पैकी मार्कांचा मोह सुटला नाही पण ऊर्दू भाषा मात्र त्यांच्याकडून शिकून घेतली. भारतीय भाषांची एकात्मता त्यांचा एकत्रित एकात्म विकास हा त्या काळी कित्येकांच्या विचारातला अजेंडा होता असे मला आता जाणवते.

१९६२ मधे देशभरात ब्लॉक डेव्हलपमेंट ही संकल्पना लागू झाली. त्या आधी पंचवार्षिक योजना ही संकल्पना आली होती. या दोन विषयांवर इंटरस्कूल कॉम्पीटीशन मधे आमच्या शाळेमार्फत टीम घेऊन मी गेले होते पहिले बक्षिस जिंकून आणले होते अस आठवत. मला पंचवार्षिक योजना या विषयावरील तयारीत मदत करणारे वडिलांचे विद्यार्थी अजून त्या बक्षिसाची आठवण काढतात.

नेहरूंवरील धड्यांत त्यांच्या वैज्ञानिक दृष्टिचा उल्लेख होता. त्यांनी नव्या वैज्ञानिक शोध-संस्था हीच आपली विज्ञान-मंदिरे आहेत अस मत मांडल होत. त्यांनी देशांत शोध-संस्थांची एक साखळीच तयार केली. भाभा अणु ऊर्जा केंद्र, इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स, नॅशनल फिजिकल केमिकल लॅबोरेटरीज, निमहान्स, ओँएनजीसी या सारख्या संस्था उभ्या राहिल्या. सायन्स बरोबरच टेक्नोलॉजी पण आवश्यक म्हणून IIT आल्या. देशातील खनिज संपतिचे योग्य तऱ्हेने विकास वितरण होण्यासाठी पब्लिक सेक्टर अंडकटेकिंग ही संकल्पना उदयाला आली. त्या अंतर्गत लोखंड, पोलाद, मैंगनीज, कोळसा, रासायनिक खते, इरिगेशन डॅम अशा कित्येक कामांसाठी पब्लिक सेक्टर कंपन्या निर्माण झाल्या त्यातून विकासाला आरंभिक गति मिळाली. देशात रेल्वे वॅगन निर्मितीसाठी कारखाना आला. डिझेलसाठी बर्मा शेलवर अवलंबून राहू नये म्हणून इंडियन ऑईलची निर्मिती झाली.

या सर्वांच्या मागे पंडित नेहरूंची “सोशॅलिस्टिक डेमोक्रसी” ची संकल्पना होती. आर्थिक विषमता कमी करण्यासाठी सरकारने स्वतः कांही व्यवसाय करून त्यातील उत्पन्न देशाच्या तळागाळापर्यंत पोचवाव अस ते उदात्त धोरण होत आणि त्याकाळासाठी ते योग्यच होत कारण एरवी विकासाला हातभार लावण्याची व्यक्तिगत क्षमता कमी होती.

जगात एकीकडे कम्युनिस्ट रशिया दुसरीकडे कॅपिटॅलिस्ट अमेरिका होते. त्या प्रगत देशांबरोबर आपली तुलना कशी कराल असा प्रश्न खूप जणांना होता. पण भौगोलिक दृष्ट्या विचार केला तर भूभाग आणि लोकसंख्येच्या दृष्टीने अमेरिका, रशिया, चीन भारत एवढ्याच देशांची गणना होऊ शकते. म्हणूनच नेहरूंच्या “नॉन अलाइनमेंट” धोरणाचे महत्व होते. त्या काळात इतर कित्येक देशांनी हे तत्व मान्य करून याचे नेतृत्व एका परीने नेहरूंकडे सोपवल होत ही देशाला अभिमानाची गोष्ट होती.

त्यामुळे देशाने कम्युनिस्ट तत्वज्ञान मान्य केले नसले तरी सोशलिस्ट तत्वज्ञान मान्य केले होते. या सर्व सामाजिक मूल्यांची झलक त्या काळांत रचले गेलेले साहित्य, सिनेमा यांच्यातून मिळू शकते. धूलका फूल, फिर सुबह होगी, सुजाता, पैगाम, नया दौर, जिस देशमे गंगा बहती है या सारखे सिनेमे या सामाजिक जाणिवेतूनच तयार झाले होते.

सरकार व्यवस्थित चालवण्यासाठी एक मजबूत फळी टीम असावी लागते. ब्रिटिशांनी देखील त्यांच्या काळांत सिव्हिल सर्विसेस, पोलिस, फॉरेस्ट मॅनेजमेंट, रेल्वे, पोस्ट अँण्ड टेलीग्राफ सर्विस, इत्यादींची स्थापना करून ठेवली होती. स्वांतंत्र्यानंतर मधे जेमतेम एकच वर्षाचा काळ गेला असेल. १९४९ पासून आयसीएस ऐवजी भारतात स्वतःची अशी आयएएस सर्विस सुरू झाली. परीक्षा, ट्रेनिंग आणि लगेच असिस्टंट कलेक्टरचे पोस्टिंग ही व्यवस्था करण्यासाठी देशाला फक्त वर्ष पुरली. याच पद्धतीने आयपीएस ची सुरूवात देखील झाली.

साहित्य क्षेत्रातही नव्या तऱ्हेचे लेखन उदयाला येत होते, हे दिसून येते. गदिमा, पेंडसे, शिवरामन (मल्याळी) किंवा हिंदीतील दिनकर, मैथिलीशरण, बंगालीतील महाश्वेतादेवी यांचे साहित्य हेच सांगून जाते.

थोडक्यांत हा पंचवीस वर्षांत काळ नवनिर्माणाचा काळ होता असे म्हणता येईल. राज्य घटना, पंचायत पद्धतीने विकास, प्रशासन व्यवस्था, निवडणूक प्रणाली, भाषांचा विकास,पंचवार्षिक योजना, आकाशवाणी, रस्ते रेल्वेचे जाळे, गांव तिथे रस्ता टाइपच्या योजना, चिंतामणराव देशमुख यांनी घडवलेल्या रिझर्व्ह बँक ऑक इंडिया आणि जीवन विमा या दोन संस्था , विकासासाठी शाळा कॉलेज हॉस्पिटल्सची संख्या वाढवणे, थर्ड वर्ल्डचे नेतृत्व, विदेश नीतिच्या अंतर्गत सार्क सारख्या संस्थेची स्थापना नेतृत्व, ओएनजासी, इंडियन ऑईल, फर्टिलाइझर्सचे कारखाने, साईंटिफिक रिसर्च साठी सीएसआयआर इतर कित्येक रिसर्च लॅब्जची स्थापना, न्यूक्लियर पॉवर जेनेरेशन योजना, मिग विमानांचा कारखाना, अणुशक्तिनगर आयआयटी, कृषि तंत्रज्ञानाचा विकास, या सारखी कामे हाती घेतली जात होती. तिथे काम करणारे अधिकारी कर्मचारी एका जबाबदारीची जाणीव अभिमान बाळगून होते. याच काळांत महाराष्ट्रात मराठवाडा मुक्ती आंदोलन गोवा मुक्ती आंदोलन देखील यशस्वी झाले. धरणे बांधली गेली. भाखरा नांगल धरण ठरवलेल्या मुदतीच्या आधीच पूर्ण करण्याची जिद्द बाळगणारे तसे करून दाखवणारे इंजिनियर आपल्या देशांत होते आणि या जिद्दीची तत्काळ दखल घेऊन त्यावर कादंबरी (भगीरथाचे पुत्र) लिहणारे गोनिदांसारखे लेखक होते.

याला गालबोट लागेल अशा दोन गोष्टी घडल्या. स्वातंत्र्यानंतर लगेचच ऑक्टोबरमधे पाकिस्तानी फौजांनी कबाइलींना पुढे करून काश्मीरचा लचका तोडून एक मोठा भूभाग कबजात घेतला त्यावर आपल्या फौजांनी लगेच कारवाई करून तो भाग परत मिळवला असता, पण नेहरूंनी स्वबळ दाखवता हा प्रश्न संयुक्त राष्ट्रसंघ या अंतर्राष्ट्रीय संस्थेकडे नेला आणि त्याला चिघळू दिले. साधारण तसेच बोटचेपे धोरण दाखवत भारतातील काश्मीरसाठी घटना कलम ३७० लाऊन तिथेही असंख्य प्रश्न निर्माण होण्याचे बी पेरून ठेवले. त्यानंतर १९६२ मधे चीनने तिबेटचा कब्जा घेतला त्याला आपण विरोध केला नाही आणि पुढे चीनने आपल्यावरच आक्रमण केले त्याहीवेळी आपण हार पत्करली. नेहरूंच्या त्या पळपुट्या धोरणाची खंत सर्वांना आजपर्यंत लागून राहिली आहे. पण त्याचा खंबीर विरोध आजही आपल्याला जमलेला नाही. त्यापुढे झालेल्या भारत पाक युद्धातील लालबहादुर शास्त्रींच्या मुत्सद्देगिरीने पुढे बांगला देश निर्मितीमधे इंदिरा गांधीच्या भूमिकेने थोडी कसर भरून काढली असली तर चीनच्या बाबतीत आपले धोरण कायमपणे कचखाऊ भयाक्रांत असेच राहिले आहे.

एकूण पहिला पंचवीस वर्षांचा काळ पाहिला तर अगदी सुरूवातीला राजकीय नेतृत्व सरस होते. त्या नेत्यांनी प्रशासनिक व्यवस्था, विकास आणि विकासाची फळे तळागाळापर्यंत पोचवणे यांना महत्व दिले होते. त्यामुळे व्यवस्था, विकास वितरण या तीन्हींची चढती कमान होती. यामधे येणारे प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षण तज्ञ्ज्ञ, उद्योजक, शिक्षक इंजिनियर्स, वैज्ञानिक, सैनिक, शेतकरी, कामगार, डॉक्टर्स असे सर्वच जण आपण देशासाठी, देशगौरव वाढण्यासाठी काही तरी करत आहोत ही कमिटमेंट घेऊऩ काम करत होतो. मात्र हळूहळू भ्रष्टाचार राजकीय नेतृत्व घसरणीला लागल्याची चिन्हें दिसू लागली होती.

१९७५ ते २००० हा काळ संभ्रमाचा त्याचबरोबर खूप स्थित्यंतरे नवतंत्रज्ञानाचा काळ होता असे मला वाटते. बांगला- देश निर्मितीमुळे इंदिरा गांधींना एक वलय प्राप्त झाले होते आणि त्याचा थोडा फायदा परराष्ट्र धोरणात मिळत होता. अणु- उर्जा, युद्ध-क्षमता, मिसाइल्स- संशोधन, उपग्रह-दळणवळण, आकाशवाणी सोबत टिव्ही या तंत्राकडे जास्त लक्ष पुरवून इंदिरा गांधींनी त्यांना उर्जितावस्था आणली. तसेच त्यांच्या प्रोत्साहनामुळे कृषिक्षेत्रात संशोधन होऊन आधीच हरित क्रांती आलेली होती आणि देशातील खाद्यान्न- संकट ठामपणे टळले होते. पण एव्हाना आर्थिक सत्तेची बेटे निर्माण होऊन त्यांचा विस्तार होण्यास सुरवात झाली आणि त्या मंडळींनी विधीनिषेध झुगारून दिले. त्यांना राजकारण्यांची साथ ही मिळू लागली. एव्हाना औद्योगिक विकासासाठी आणलेल्या पब्लिक सेक्टर संस्था आत्मलुब्ध होऊ लागल्या होत्या. त्या इतर सामाजिक विकासासाठी असलेल्या शासकीय विकास-यंत्रणा या दोघांकडे शासकीय योजनेपोटी येणारा पैशाचा सत्तेचा वाटा मोठा मोठा होत होता. त्या मानाने त्यांचे ट्रेनिंग सचोटी कमी पडत होते. पण याची जाणीव फारशी कुणाला नव्हती. दुसरीकडे नवउद्योजक राजकारणी यांचेशी हातमिळवणी केल्यास संपत्तीत वाटा मिळतो हे ध्यानात घेऊन काम करणारे अधिकारी वरचढ होऊ लागले तसे मान्य करणारे अधिकारी मागे पडू लागले. एक तिसरी महत्वाची बाब संपूर्ण दुर्लक्षित झाली. निर्माण केलेल्या प्रत्येक संस्थेची देखरेख करावी लागते, देखरेखीसाठी लागणारी व्यवस्था वेगळ्या प्रकारची असते. या देखरेखीकडे संपूर्ण दुर्लक्ष झाले. नव्या नव्या संस्था निर्माण करण्यामधे लोकांना रस वाटू लागला. कारण त्यासाठी जास्त पैसा मिळत होता. त्यात जास्त ग्लॅमर होते आणि कमी कष्ट होते. या काळात मी अनुभवले की अधिका-यांची वर्गवारी त्यांच्या कामावर ठरत नसून त्यांनी किती बजेट मिळवले त्यावर ठरत होती. त्यामुळे ज्यादा बजेट मिळवून ते कसेबसे खर्च करण्याकडे कल वाढला. त्य़ामुळे काही प्रसंगी एखाद्या ऑफिसात भ्रष्टाचार नसेल तरी निष्काळजीपणा भरपूर होता असेही चित्र आढळले.

जुन्या निर्मितीवर देखरेख ठेवल्याचा पहिला फटका बसला तो शिक्षण व्यवस्थेला. सरकारी शाळांची स्थिती खालावली, इमारतींची पडझड, साधे खडू फळ्याला पैसे नसणे, शाळांची इन्सपेक्शन्स, शिक्षकांचे प्रशिक्षण, नव्या वर्षाच्या सुरवातीला वेळेवर पुस्तके मिळणे, क्रीडांगण शौचालये नसणे, शिक्षक भरती होणे इत्यादी. यामुळे शिक्षण क्षेत्रातच सुसंपन्न खाजगी विरूद्ध विपन्न सरकारी शाळा असा दुजाभाव सुरू झाला सरकारी शाळा मोडीत निघून खाजगी शाळांचा संचार वाढला. त्यामधे भरमसाठ फी, दिखावा संस्कृती, इंग्रजीवर भर आणि मातृभाषेचे खच्चीकरण असे दुर्गुण शिरले. कॅपिटेशन कॉलेजेस मधून प्रवेश घेणाऱ्यांना लाखाच्या घरात फी भरावी लागत होती. उन्नीकृष्णन जजमेंट मुळे हा धुमाकूळ थोडा थांबला पण मणिपाल इस्लामिक फाउंडेशनच्या जजमेंट मुळे २००३ नंतर पुन्हा सुरू झाला. त्यामुळे १९९३ ते २००३ हा काळ वगळता शिक्षण क्षेत्र अत्यंत महागडे तरी किंवा अत्यंत निष्प्रभ तरी असे चित्र गेली २५ वर्षे निर्माण झाले आहे. त्यामधे सुलभतेने उत्तम शिक्षण मिळणे हा प्रकार संपला. याचे दुष्परीणाम येत्या काळात जेंव्हा दिसतील तेंव्हा पहिला बळी आरोग्य क्षेत्राचा गेलेला असेल कारण २०-३० लाख रूपये खर्च करून डॉक्टर झालेला कोणता डॉक्टर सेवाभावाने हा पेशा करू शकेल?

पण देखरेख ढासळली त्याचा फटका इतर क्षेत्रांनाही बसत आहेच. रस्ते, धरणे, पोस्टल सेवा, सरकारी कार्यालयांतील व्यवस्थापन अशा सर्व ठिकाणी ही पडझड दिसून येते. देखरेख रहाण्यासाठी लागणारे कौशल्य हे निर्मिती- कौशल्यापेक्षा वेगळे असते. घर बांधायला इंजिनियर लागत असेल, पण रंग काढायला पेंटर लागतो. अशा देखरेख ठेऊ शकणाऱ्या कुशल कामगारांची तसी करवून घेणाऱ्या अधिकाऱ्यांची मोठी चणचण जाणवू लागली. आणि तरीही त्याकडे अजून संपूर्ण दुर्लक्षच आहे. म्हणूनच कौशल्य शिक्षणावरचे बजेट हे एकूण शिक्षण क्षेत्राच्या बजेटच्या तुलनेत पाच टक्क्यांपेक्षाही कमी आहे.

याचा अर्थ असा नाही की त्या पंचवीस वर्षात नव्या संस्था तयार झाल्या नाहीत. झाल्या, पण एक म्हणजे तिकडचे लक्ष दिल्याने जुन्या संस्था अडगळीत टाकल्या गेल्या. दुसरे म्हणजे नव्या गोष्टी अगर संस्थांच्या टिकाऊपणासाठी कुणालाच काही देणे घेणे नव्हते. म्हणून त्यांची देखील व्यवस्था तकलादू असून त्यांचेही आयुष्य कमीच असणार. एक उदाहरण द्यायचे तर आपल्याकडे नवा रस्ता बांधल्यावर कागदोपत्री त्याचे आयुष्य २० वर्षे ठरले असले तरी दोन तीन वर्षातच त्याच्यावर काही तरी कारणाने खोदकाम येते किंवा खड्डे तरी पडतात. चीन मधे रस्त्याच्या कॉन्ट्रॅक्टरला उर्वरित आयुष्याच्या काळासाठी जबाबदार धरून त्याला कैदेच्या जप्तीच्या शिक्षेची तरतूद आहे.

पडझडीचे दुसरे उदाहरण म्हणजे न्याय- व्यवस्था. जेंव्हा सुप्रीम कोर्टाच्या जजाविरूद्धच लाचखोरीची केस येते तेंव्हा या पडझडीचा आवाका लक्षात येतो. त्याही पेक्षा वाईट म्हणजे कोर्टात रेंगाळलेला न्याय. म्हणूनच तारीख पे तारीख हे वाक्य टाळ्या घेऊन जाते.

मात्र १९७५ ते २००० या काळात काही क्षेत्रात नेत्रदीपक प्रगती झाली. पहिले क्षेत्र सूचना दळणवळण. टीव्ही ट्रान्समिशनचे जाळे, त्यांत खाजगी चॅनेल्स, रेल्वे यंत्रणेचा विस्तार बऱ्याच अंशी सुसूत्रीकरण, टेलिफोन सेवेमध्ये मोठी वाढ, मोबाईल, संगणक, IT Market म्हणून भारताला लाभलेली नवी ओळख, अंतरिक्ष- कार्यक्रम इत्यादि नावे सांगता येतील. याच काळात पूर्वीच्या लायसेन्स परमिट कोटा सिस्टमचा त्याग करून आपण फ्री एकॉनॉमिकडे वळलो. हे जे घडले ते बरे की वाईट याचे उत्तर देताना जे घडले ते तारतम्य बागळता घडले ते तारतम्य बाळगता घडले असे दाखवणारी कित्येक उदाहरणे आहेत. एक उत्तम उदाहरण म्हणजे विमान- सेवा क्षेत्रात एअर इंडियाची झालेली दुर्दशा. खूप जणांनी अनुभवले आहे की एअर इंडियाला जाणून बुजून सत्तेचा वापर करून मागे ढकलण्यांत येते होते, जेणे करून प्रायव्हेट कंपन्यांचा फायदा व्हावा. यामुळे प्रायव्हेट क्षेत्रात उतरलेले उद्योजक दोन तऱ्हेचे होते. ज्यांना लहान असण्यात समाधान असेल त्यांना लाचखोरीशिवाय वेळ भागवता येत होती. पण मोठे व्हायचे असेल तर गुणवत्तेऐवजी स्मार्टनेस हेच त्यांचे भांडवल होते. काही अपवाद वगळता येतील. याची उदाहरण मला दिसतात ती सत्यम् घोटाळा, एनरॉन, कारगिल या सारख्या कंपन्याच्या व्यवहारात जिथे भांडवलदारांसोबत अधिकारी, राजकारणी, बँका यांनीही हात धुवून घेतले.

फ्री एकॉमनॉमीच्या तंत्रासोबत अजून धोरणे आली जी मला संशयास्पद वाटतात. फ्री एकॉनॉमीच्या धोरणाने प्रगती आली हे दाखवण्यासाठी शेयर मार्केटमें उछाल हा एक निकष होता. त्या हव्यासापायी आधी वार्षिक बजेट मधे मुदत ठेवींना अनुत्साहित करून शेयर व्यवहारांना प्रोत्साहन देणारी कन्सेशन्स देण्यात आली. अजूनही जे वृद्ध आहेत किंवा ज्यांना आपली गाढया मेहनतीची कमाई शेयर मधे लावणे नको वाटते त्यांना वेळोवेळी अत्यंत कमी दराच्या मुदतठेवींवर समाधान मानावे लागते कारण शेअर बाजारांचा जुगार त्यांना परवडण्यासारखा नसतो. बरे हा शेअर व्यवहारही क्लीन नाही हे वेळोवेळी झालेल्या स्कॅम्स मधे दिसते. हर्षद मेहता, केतन पारेख, कॅनफिन इंडिया बँकेचे घोटाळे, नुकतेच LIC मधे उघडकीला आलेले घोटाळे, मध्यंतरी झालेली UTI ची नामुष्की हे सर्व दाखवतात की शेअर बाजारात उछाल आणून वरची मलाई वरच्या वर लाटता येते. फक्त तुमचे हाच वरपर्यंत पोचले असतील तरच. या मधे विदेशी वित्त कंपन्यांची खोडसाळपणाची क्षमता अजून मोठी असते पण फ्री इकॉनॉमीच्या नावाने आपण ते मान्य करतो.

यामुळे आपल्या नव्या औद्योगिक धोरणात तीन चार गंभीर प्रश्न निर्माण होतात. औद्योगिक क्षेत्र पुढे आणण्यासाठी शेतीला दुय्यम दर्जा दिला गेला. वन कृषि जमीन कधीही कशीही अधिग्रहण करण्यासाठी पूर्वी असलेला कायदा जणू कमी होता म्हणून सेझ ( स्पेशल इकॉनॉमिक झोन) साठी अधिक कडक कायदा केला ज्यामुळे शेतकऱ्यांच्या खुद्द सरकारच्या हक्कांवर गदा येऊन उद्योजकाला ज्यादा हक्काचे धोरण आले. या मधे विरोध करणाऱ्याला जागा नव्हती, तसेच जो स्मार्टनेस दाखवू शकत नसेल त्यालाही नव्हती. एका परीने म्हणावे लागेल की ज्या उद्योगांचे राजकारण्यांसोबत साटेलोटे असेल त्यांनाच वाव होता.

मग आर्थिक प्रगती झाली हे दाखवणे गरजेचे होते, त्यासाठी जे धोरण आखले त्याची तुलना मी एका गोष्टीशी करते. एका गावात सर्व गरीब लोक होते मग गावाचा GDP वाढवण्यासाठी बाहेरच्या एका श्रीमंत माणसाला गावात मोठा बंगला बांधण्याची विनंती केली. त्याला जमीन, पाणी, वीज, डबर इत्यादी मोफत दिले. बंगला बांधला जाऊन त्याचे बाजारमूल्य देखील गावाच्या संपत्तीत मोजले गेले. असा तऱ्हेने गावाचा GDP वाढला. आपणही हेच करतो आहोत. ठराविक श्रीमंत विदेशी कंपन्यांना भरमसाठ कन्सेशन्स देऊन ते नफा कमवतात तो आपल्या देशाचा GDP वाढलेला दाखवण्यासाठी उपयोगी पडतो. पण प्रत्यक्षात तो नफा त्या त्या देशात किंवा स्विस बँकेत जात असतो.

सामाजिक आर्थिक क्षेत्रातील वाटचाल अशी असतानाच राजकीय नेतृत्व अधिकच खालावत होते असेच दिसते. बहुतेक नेते या ना त्या कारणाने टेंटेड झालेले दिसून येते. अशा पाश्वभूमीवर नवे शतक, नवे सहस्त्रक उजाडले बघता बघता त्याचीही दहा वर्षे उलटली. या दहा वर्षात स्कॅम्स मधील संपत्तीची व्याप्ती अतोनात वाढली. नेतृत्व एवढे दुर्बल झाले की अण्णा हजारेंच्या आंदोलनात त्यांच्याएवढ्या जनमान्यतेचा नेता दिसेना. करप्शन आणि भूखंड लाटणे, अमाप श्रीमंतीत लोळणे हे सत्ताधाऱ्यांचे व्यवच्छेदक लक्षण बनले. म्हणूनच एण्टी करप्शन किंवा लोकपाला बिलासारखा कायदा चाळीस वर्षे मान्य होत नाही, पण लोकसभा- विधानसभा सांसदांचे पगार एका क्षणांत दुपटी- तिपटीने मान्य होतात.

आतातर गरिबीची विचित्र व्याख्याही ठरली. शहरात ३२ रू रोज मिळवणारा माणूस (घरांत खाणारी तोंडे आहेत अस धरून) म्हणजे महिन्याला फक्त १००० रू मिळणारा माणूस गरीब नाही. आता फक्त एकच व्हावे. प्लानिंग कमिशन सदस्यांना मुंबईत फुकट घर देऊ या आणि १००० रूपयात तीन महिने जगून दाखवा असे सांगू या.

या सर्व वातावरणांत आशेचा मोठा प्रकाश मला दिसतो तो मध्यवर्गीयातील तरूणाई. ती आता जागरूक आहे आणि भ्रष्टाचार सहन करणार नाही. त्यांचा कल स्वतः भ्रष्टाचार करण्याचा आहे. त्यामुळे त्यांच्यामधून नवे नेतृत्व निर्माण होऊ शकते. त्यांनी राजकीय क्षेत्रात उतरावे यासाठी प्रयत्न करावे लागतील. महिलांनी राजकीय क्षेत्रात उतरावे हे प्रयत्न करावे लागतील आणि प्रायोरिटी ठरवतांना बाह्य आंतरिक सुरक्षा, टेरिझमचा कणखरपणे बिमोड, आर्थिक क्षेत्रात चीन किंवा फॉरेन इन्वेस्टर्स समोर शरणागती पत्करणे, कृषी, शिक्षण आणि आरोग्य क्षेत्रातील सेवांचे पुनरूज्जीवन, सरकारी क्षेत्रांत, कौशल्य- शिक्षण, स्त्रीभ्रूण हत्या थोपवणे, आणि सामाजिक हार्मनीची वाढ या गोष्टींना अग्रक्रम देत नव्या पिढीला वाटचाल करावी लागेल.

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