Tuesday, July 11, 2017

Monday, June 26, 2017

अनास्था मत -- यादों के झरोखेसे कुछ पन्ने

अनास्था मत -- यादों के झरोखेसे कुछ पन्ने
पिछले छः सात महीनोंमें चुनावोंका एक लम्बा दौर चला और समाप्त हुआ है। कुछ छिटपुट चुनावोंको छोड दें तो अगले महत्वपूर्ण चुनाव अब २०१९ में ही होंगे। यही अन्तराल है जब हमें चिन्तनके स्तर पर अपनी चुनावी प्रक्रियाके संबंधमें सोचना पडेगा और अनास्था मतके महत्वको समझाना पडेगा ।
मतदानकी प्रकियासे मैं बचपनसे ही उत्साहित थी । १९५५ मे मतदानके लिये जाते हुए माँ-पिताजी पांच वर्षकी आयुमें मुझे भी साथ ले गये और मतदान केंद्रपर बैठे प्रिसायडिंग अधिकारीने भी कहा- हाँ, हाँ ले जाइये अन्दर, भावी पीढीको भी पता चले कि मतदान कैसे करते हैं, बस अपना मत किसे दिया यह न बताइयेगा ।
सो जबलपूरके किसी स्कूलमें खुले उस मतदान केंद्रका दृश्य, मतदाताओंकी कतार और वह मुख्याध्यापक जैसे दीखनेवाले प्रिसाइडिंग अधिकारी आज भी आँखोंके सामने चलवित्रकी तरह घूम जाते हैं
फिर IAS की नौकरीमें आई तो वरिष्ठ चुनाव अधिकारीके नाते और भी गहराईसे इस प्रक्रिया को देखा । दो - तीन बार तो आकाशवाणी केंद्रसे भी भाषण दिया कि निर्भय होकर और केवल अपने मनसे पूछ कर मतदान करें, कर्तव्यभावनासे करें, इत्यादि। लेकिन अस्सीके दशकके आते आते मेरे कई भ्रम टूटने लगे।
अब चुनावोंसे वे उम्मीदवार बाहर हटने लगे जिसकी सच्चाई और विवेकशीलता पर निःसंदेह भरीसा किया जा सकता था । आयाराम गयाराम और बाहुबलीयों का बोलबाला बढता गया । चुनाव जीतना ही एकमेव लक्ष्य हो गया चाहे जिस विधी से हो। चुनावी टिकट भी ऐसे उम्मीदवारोंको दिये जाने लगे जो अपने कामसे नही वरन पैसे और जातीके नाम पर मतोंको बटारे सकें। किसी भ्रष्ट नेताके विरूध्द रणशिंग फूँकनेवाली पार्टी उसी नेताकी अगुआईमें मंत्रिमंड बनाये और सत्तामें आ पानेकी खुशी मनाये यह भी देख लिया। उम्मीदवार भी ऐसे उतरने लगे जैसे चावलकी थालीमें केवल कंकड ही कंकड दिखें।
चुनावी अधिकारी होनेके नाते अनास्था मत की अवधारणासे मेरा परिचय था। तब जो पीपुल्स रिप्रेझेंटेशन अॅक्ट चलनमें था, उसमें ऐसी संभावना पर विचार किया गया था कि कोई मतदाता ऐसा भी होगा जो कहे कि ये सारे उम्मीदवार निकम्मे हैं, मेरा मत किसी को नही जायगा। लेकीन इस संभावनाके लिये उपाय बडा ही कमजोर बनाया गया था। वह व्यक्ती मतदान केंद्र पर पहुँचकर प्रिसाइडिंग ऑफिसरसे अपनी बात कहे, फिर एक फॉर्म भरकर दे जिसमें वह यही बात लिखकर दे। चुनाव अधिकारी उसकी मतपत्रिका को रद्द करें और उसके फॉर्मके साथ एक अलग लिफाफेमें सील करे। मतगणना के बाद ऐसे लिफाफे नष्ट किये जायें । मतगणनामें उनका कोई भी ब्यौरा न होगा।
इस प्रकार एक मतदाता इस बातके लिये मजबूर है कि वह बुरे उम्मीदवारोंमें से ही किसीको चुने या फिर वह यदि कुछ और कहना चाहे, फॉर्म भरकर दे दे, तो उसकी कोई सुनवाई नही। उसका मत कचरेके ढेरमें जायगा । लोकतंत्रमें यही तो महत्वकी बात है कि मतदाताकी आवाज सुनीं जाये, और पहले प्रावधानमें वही नही हो रहा था।
इस पर काफी विचार करके मैंने पुणेके मराठी दैनिक सकाळमें १९८८ में अपना पहला लेख लिखा कि क्यों नापसंदगीके मतोंकी भी गणना होनी चाहिये। यह गणना सभी उम्मीदवारोंको आत्मबोध करवानेका एक छोटासा प्रयास होगा कि बंधुओं तुम सभीसे हम तंग आ चुके हैं। उनकी पार्टीको भी इस आवाजको सुनता पडेगा।
मेरे लेखपर कईयोंने प्रतिक्रिया दी कि वे सहमत हैं। धीरे-धीरे यही मत मुझे कई अन्य मंचोंसे भी सुननेको मिला।
जब संगणकोंका चलना तेज हो गया और इंटरनेटका भी जमाना आया तो गूगल पिटीशन जैसे कई अॅप्लीकेशन बनकर उपलब्ध हुए जिनके माध्यमसे आप कोई मुहिम चलायें। फिर मैंने भी एक मुहिम चलाई जिसमें चुनाव आयोगसे व सांसदोंसे अपील थी कि वे अॅक्टमें ऐसा संशोधन लायें जिससे अनास्था मतकी गणना हो और चुनावफलकी घोषणामें इन मतोंके आँकडें भी बतायें जायें -- जबतक यह नही होता, मेरा लोकतांत्रिक अधिकार अधूरा है, मेरा नागरिकताका हक छीना जा रहा है, इत्यादि । उसकी जो टिप्पणी बनाई उसमें पहले पंद्रह दिनोंमें ही प्राय़ः तीन हजार लोगोंने सहमति दिखाई थी। उसमें एक ग्रुप तो ऐसा था जिसके ८२ सदस्य थे। अर्थात एक साथ समूह बनाकर, एकमत होकर लोग इसकी चर्चा करने लगे थे।
इसी अन्तराल में निर्वाचन आयोगने भी यही सुझाव देते हुए सरकारसे आग्रह किया कि मौजूदा अॅक्टमें सुधार कर ऐसा प्रावधान लाया जाय कि अनास्था मत भी डाला जा सके और उसकी गिनती हो । मामला सर्वाच्च न्यायालयमें भी गया। सांसदोंमें कइयोंको ऐसा संशोधन पसंद नही था क्योंकि इससे उनकी उम्मीदवारी संशयके घेरेमें आती थी, उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगता था । सो निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और संसद इन तीन कार्यालयोंमें इस फाईलने हजारों चक्कर लगाये।
फिर एक बार श्री अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने और उन्होंने जनतासे अवाहन किया कि चुनावके दिन घरमें बैठे न रहें बल्कि केंद्र पर जाकर मतदान अवश्य करें। तब खीझ कर मैंने एक लेख फिर लिखा जिसका शीर्षक था -- इस चुनाव में मैं बेजुबान (दै. हिन्दुस्तान) । यदि मैं किसी भी उम्मीदवार को पसंद नही करती तो मेरे इस मत की सुनवाई कौन करेगा? यदि उसकी गणना नही हुई तो मैं तो बेजुबान ही रही । खैर, चुनावी सुधार तब भी नही हुए मैंने एक नया मराठी लेख भी दै. महाराष्ट्र टाइम्सके लिये लिखा जिसमें मेरे तर्कके साथ साथ चुनाव आयोगके प्रयासोंका ब्यौरा भी था। अबतक जनमानस भी इसके पक्षमें होने लगा था।
इसी अन्तराल में तत्कालीन सांसद तथा मंत्री सचिन पायलटने पत्रकार परिषदमें इस पूरी मुहिमको गलत बताते हुए मतदाताओंसे आवाहन किया कि वे अपने क्षेत्रके उम्मीदवारोंको समझायें ताकि कोई तो उन्हें अच्छा लगने लगे। यह तो बहुत दूरकी कौडी लानेकी बात थी। फिर मैंने भी प्रश्न उठाये कि सांसद होने के नाते पायलट स्वयं क्या कर रहे थे, किस प्रकार अपनी पार्टीको समझा रहे थे या किस प्रकार उम्मीदवारोंके लिये मानक तय कर रहे थे ? स्वयं उनके निर्वाचन क्षेत्रमें कितने मतदाता उनके पास पहुँचकर अच्छे उम्मीदवार लानेकी चर्चा कर रहे थे ? लेकिन मुझे पता है कि सामान्य व्यक्तिके ऐसे प्रश्न मंत्रियों या पार्टी-वरीष्ठों तक नही पहुँचते।
खैर, अन्ततोगत्वा सभी ओरसे शब्द उठने लगे, प्रतिक्रियाएँ आने लगीं, तो सांसदोंने इस सुझावको मान लिया और इस प्रकार अनास्था मत दर्शानेकी इच्छा रखनेवालोंके लिये मतपत्रिकामें और EVM मशीनमें ही एक चिहन बना ताकि जिस मतदाताको कोई भी उम्मीदवार अच्छा न लगे, वह सबोंके प्रति अपनी अनास्था जता सके । अब मतगणनाके पश्चात जब प्रत्येक उम्मीदवारकी मतसंख्या घोषित होती है, तब अनास्था मतोंकी संख्या भी बताई जाती है।
सो, देश या समाजके नाते मंजिलकी ओर एक-दो पग तो हम चल लिये। लेकिन वामन अवतार पूरा करने के लिये तीसरा पग रखना पडता है और उससे पहले वामन रूपको त्यागकर विश्वरूप धारण करना पडता है।
इस दिशामें अभी भी लोकमानसमें जागृति लानी बाकी है कि यदि उन्हें सारे उम्मीदवारोंकी नीयत पर संदेह है तो बेझिझक अनास्था मतका ही बटन दबायें । चैनलों पर जो सैकडों वाद-विवाद होते रहते हैं, उनमें भी अभीतक मतगणनामें घोषित इन अनास्था आँकडों पर कोई वक्तव्य नही आया है। लोगोंको अपने मत प्रदर्शनका अधिकार तो मिल गया लेकिन उसकी अपार संभावनाएँ अभी उनके अन्तस्थलको नही छू पाई हैं।
इसका एक महत्वपूर्ण कारण भी हैं। २०१४ में अन्य सभी पक्षोंसे निराश मतदाताओंके बीच भाजपाने एक बडी आशाका संचार किया । इसका श्रेय निःसंदेह श्री मोदीजीका है। यह आशा इतनी बलवती रही कि लोगोंने अपना निश्चित मत भाजपाके पलडेमें डाला। लेकिन आज फिर भाजपामें अन्य पक्षोंसे आयातित ऐसे कई उम्मीदवार आ गये हैं जिनपर लोगोंको संदेह है। मोदी पर यह भरोसा जरूर है कि वे इन उम्मीदवारोंको कुछ भी गलत करनेसे रोकेंगे और उनकी सांसदीय ऊर्जाको सही दिशामें ही चलवायेंगे। जब तक यह भरोसा कायम है, अनास्थामत रूपी शस्त्र बाहर निकालना आवश्यक नही। लेकिन निराशाका दौर आये तो यह उपयोगी है, इसीलिये बीच बीचमें इसकी चर्चा अवश्य होती रहनी चाहिये। शुभम भूयात्
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Thursday, June 08, 2017

माझी बजेटातील उदासीनता अशी संपली --चित्रप्रत तरुण भारत मार्च २०१४

माझी बजेटातील उदासीनता अशी संपली

तरुण भारत मार्च २०१४ ( 27/2/14 रोजी दुरुस्ती करून पाठवले होते)




Wednesday, June 07, 2017

Reflections on India Too complacent and too conservative

Sean Paul Kelley is a travel writer, former radio host, and before that an asset manager for a Wall Street investment bank that is still (barely) alive. He recently left a fantastic job in Singapore working for Solar Winds, a software company based out of Austin to travel around the world for a year (or two). He founded The Agonist, in 2002, which is still considered the top international affairs, culture and news destination for progressives. He is also theGlobal Correspondent for The Young Turks, on satellite radio and Air America .

 If you are Indian, or of Indian descent, I must preface this post with a clear warning: you are not going to like what I have to say. My criticisms may be very hard to stomach. But consider them as the hard words and loving advice of a good friend. Someone who’s being honest with you and wants nothing from you.  

These criticisms apply to all of India except Kerala,Goa and the places I didn’t visit, except that I have a feeling it applies to all of India , except as I mentioned before Goa and Kerala.  

Lastly, before anyone accuses me of Western Cultural Imperialism, let me say this: if this is what India and Indians want, then hey, who am I to tell them differently. Take what you like and leave the rest. In the end it doesn’t really matter, as I get the sense that Indians, at least many upper class Indians, don’t seem to care and the lower classes just don’t know any better, what with Indian culture being so intense and pervasive on the sub-continent. But here goes, nonetheless.  

India is a mess. It’s that simple, but it’s also quite complicated. I’ll start with what I think are India ’s four major problems–the four most preventing India from becoming a developing nation–and then move to some of the ancillary ones.  

First pollution. In my opinion the filth, squalor and all around pollution indicates a marked lack of respect for India by Indians. I don’t know how cultural the filth is, but it’s really beyond anything I have ever encountered.  At times the smells, trash, refuse and excrement are like a garbage dump.  
Right next door to the Taj Mahal was a pile of trash that smelled so bad, was so foul as to almost ruin the entire Taj experience. Delhi , Bangalore and Chennai to a lesser degree were so very polluted as to make me physically ill. Sinus infections, ear infections, bowels churning was an all to common experience in India . Dung, be it goat, cow or human fecal matter was common on the streets. In major tourist areas filth was everywhere, littering the sidewalks, the roadways, you name it. Toilets in the middle of the road, men urinating and defecating anywhere, in broad daylight.
  
Whole villages are plastic bag wastelands. Roadsides are choked by it. Air quality that can hardly be called quality. Far too much coal and far too few unleaded vehicles on the road. The measure should be how dangerous the air is for one’s health, not how good it is. People casually throw trash in the streets, on the roads. 

The only two cities that could be considered sanitary in my journey were Trivandrum –the capital of Kerala–and Calicut . I don’t know why this is. But I can assure you that at some point this pollution will cut into India ’s productivity, if it already hasn’t. The pollution will hobble India ’s growth path, if that indeed is what the country wants. (Which I personally doubt, as India is far too conservative a country, in the small ‘c’ sense.)

The second is infrastructure - which can be divided into four subcategories: 
 The electrical grid,  ports, roads and the railways.

The electrical grid is a joke. Load shedding is all too common, everywhere in India . Wide swaths of the country spend much of the day without the electricity they actually pay for.  Without regular electricity, productivity, again, falls.  

The ports are a joke. Antiquated, out of date, hardly even appropriate for the mechanized world of container ports, more in line with the days of longshoremen and the like.  Roads are an equal disaster. I only saw one elevated highway that would be considered decent in Thailand , much less Western Europe or America .  And I covered fully two thirds of the country during my visit.  

The roads. There are so few dual carriage way roads as to be laughable. There are no traffic laws to speak of, and if there are, they are rarely obeyed, much less enforced. A drive that should take an hour takes three.  A drive that should take three takes nine. The buses are at least thirty years old, if not older. 

The rails. Everyone in India , or who travels in India raves about the railway system. Rubbish! It’s awful.

Now, when I was there in 2003 and then late 2004 it was decent. But in the last five years the traffic on the rails has grown so quickly that once again, it is threatening productivity. Waiting in line just to ask a question now takes thirty minutes. Routes are routinely sold out three and four days in advance now, leaving travelers stranded with little option except to take the decrepit and dangerous buses.

 Getting train tickets is a terrible ordeal, first you have to find the train number, which takes 30 minutes, then you have to fill in the form, which is far from easy, then you have to wait in line to try and make a reservation, which takes 30 minutes at least and if you made a single mistake on the form back you go to the end of the queue, or what passes for a queue in India. 

At least 50 million people use the trains a day in India. Fifty million people! Not surprising that wait lists of 500 or more people are common now.  
The rails are affordable and comprehensive but they are overcrowded and what with budget airlines popping up in India like Sadhus in an ashram the middle and lowers classes are left to deal with the overutilized rails and quality suffers. No one seems to give a shit.  

Seriously, I just never have the impression that the Indian government really cares. Too interested in buying weapons from Russia, Israel, the US - I guess.  

The last major problem in India is an old problem and can be divided into two parts that’ve been two sides of the same coin since government was invented: bureaucracy and corruption.  

It take triplicates to register into a hotel. To get a SIM card for one’s phone is like wading into a jungle of red-tape and photocopies, one is not likely to emerge from in a good mood, much less satisfied with customer service.  

Government is notoriously uninterested in the problems of the commoners, too busy fleecing the rich, or trying to get rich themselves in some way shape or form. Take the trash for example, civil rubbish collection authorities are too busy taking kickbacks from the wealthy to keep their areas clean that they don’t have the time, manpower, money or interest in doing their job.  

Rural hospitals are perennially understaffed as doctors pocket the fees the government pays them, never show up at the rural hospitals and practice in the cities instead.  

I could go on for quite some time about my perception of India and its problems, but in all seriousness, I don’t think anyone in India really cares. And that, to me, is the biggest problem.

India is too conservative a society to want to change in any way.  

Mumbai, India’s financial capital is about as filthy, polluted and poor as the worst city imaginable in Vietnam, or Indonesia –and being more polluted than Medan, in Sumatra is no easy task. The biggest rats I have ever seen were in Medan!  

One would expect a certain amount of . . . (yes, I am going to use this word) backwardness, in a country that hasn’t produced so many Nobel Laureates, nuclear physicists, imminent economists and entrepreneurs. But India has all these things and what have they brought back to India with them? Nothing! 

The rich still have their servants, the lower castes are still there to do the dirty work and so the country remains in stasis. It’s a shame. Indians and India have many wonderful things to offer the world, but I’m far from sanguine that India will amount to much in my lifetime. 

Now, have at it, call me a cultural imperialist, a spoiled child of the West and all that.  But remember, I’ve been there. I’ve done it. And I’ve seen 50 other countries on this planet and none, not even Ethiopia, have as long and gargantuan a laundry list of problems as India does.
  
The bottom line is - I don’t think India really cares.
Too complacent and too conservative.

Tuesday, June 06, 2017

शेतकरी आंदोलन-- काही मुद्दे

शेतकरी आंदोलन चालूच आहे. दुःखद घटना घडतच आहेत. महाराष्ट्रासोबत मध्य प्रदेशातही व्याप्त झालेलं आहे. याला राजकीय, मोठा-शेतकरी-प्रणीत वगैरे काहीही नावे दिली तरी गरीब शेतकरी सर्व बाजूंनी नाडला जातो ही खरी गोम आहे. जमत नसेल तर शेती सोडून द्या असा आगाऊ सल्ला कित्येक जण देऊ लागले आहेत. त्यांना सर्वत्र लवासा व सहारा सिटी हवे आहे. त्यांची एकूण मांडणी पाहिली की यांना मोठ्यांच्या गळ्यात शेती दावणीला बांधायची आहे हे उघड दिसते. शेतजमीनीवर मोठाले लवासा काढा, उद्योगघंदे काढा, मोठमोठे फार्म्स करा, मेकॅनाइज्ड शेती करा, खूप खूप आणि मोठ्ठं मोठ्ठं हा त्यांचा ध्यास आहे. गरीबांनी आपण आळशी, अजागळ, मूर्ख आहोत हे भान ठेऊन श्रीमंतीमुळे आपोआप शहाण्या होणाऱ्यांनाच शेती करू द्यावी असा सल्ला आहे.
यापायीच निसर्गाचे अतोनात नुकसान होते हे ही ते विसरतात. निसर्गासोबत भावनिक बांधिलकी हे भारतीय संस्कृतीचे वैशिष्ट्य आहे. त्यामुळेच येथील निसर्ग टिकला व मनोहर राहिला. गंगा मैया जेंव्हा रिव्हर गँजेस झाली तेंव्हा कारखानीदारीने दूषित होणारी गंगा पाहून कुणाला काही वाटेनासे झाले. मग घराघरात ४०-५० वर्षे शुद्ध राहिलेल्या गंगाजळाची वैज्ञानिकतादेखील यांनी नजरेआड केली. आता एवढा कोट्यावधि टीसीएम जलसाठा असणारा गंगाप्रवाह पार घाण होऊन गेल्यावरही थोड्याच लोकांना कळू शकले आहे की संस्कृती-नाशामुळे आरोग्य-नाश आणि राष्ट्राच नाश कसा होऊ शकतो. पण आयात-संस्कृतीच्या सुभेदारांना त्याचे काही नाही --शेतमाल आयात करू, पाणी आयात करू, शासनकर्तेही आयात करू अशी आऊटसोर्सिंग संस्कृती सर्वत्र गाजते आहे. तिथे फक्त मोठे, धनाढ्य, ग्लोबल यांनाच वाव आहे. गरीब छोटे शेतकरी यांच्या डोळ्यांनी खुपतात. त्यांना इनएफिशिएंट ठरवून जमीन विकण्याचा सल्ला दिला जातो. मग इनएफिशिएंट असलेल्या राज्यकर्त्यांना बाहेर काढून एफिशिएंट चीनी किंवा अमेरिकन राज्यकर्ते का नकोत ?
शेतकऱ्यांना सहकारी कारखानदारीच्या नावाने लुबाडणारे व चुकीच्या दिशेने नेणारे जाणते राजे एकीकडे आहेत तर भारतीय शेती ही जगातील अमेरिकन-चीनी-युरोपीय शेतीपेक्षा कशी आगळी-वेगळी व युनिक आहे हे न समजू शकलेले राज्यकर्ते दुसरीकडे आहेत. पाळेकरांसारख्या कृषितज्ज्ञाला पद्मभूषण तर द्यायचे पण त्यांच सल्ला मात्र घ्यायचा नाही -- तो जाणत्या राजाचाच घ्यायचा कारण पाळेकर विकेंद्रित छोट्या शेताबद्दल बोलतात तर जाणते राजे मोठ्ठे-मोठ्ठे हाच मंत्र जपतात.
नोटबंदीनंतर बँकांकडे खूप पैसा गोळा झाला आहे. तो ग्रामीण भागात व शेतीकडे किती प्रमाणात वळवला ती आकडेवारी जाहीर करावी. ग्रामीण भागात छोटी छोटी पणन केंद्रें व ग्राहकाशी थेट संपर्क करायला प्रभावी इंटरनेट या सुविधा तातडीने निर्माण करा. सकस अन्न देणाऱ्या बीजप्रजाति, सेंद्रिय शेती, देशी गाई, देशी वाण यांचे उपकारक परिणाम दिसत आहेत त्यांची तातडीने दखल घ्या, भारतीय शेतीला १९७५च्या आसपास एकत्रिकरणाचा कायदा लागू केला तो बासनात गुंडाळावा लागला याची दखल घ्या.
संप संपवा नाहीतर शहरी जीवन सुकर करण्याचे कारण दाखवुन कायदा आणून सर्व शेतजमीनी अंबानींना देऊ व तुम्हाला तिथे गुलामी करायला लाऊ अशा धमक्या देणाऱ्या पोस्ट देखील सोशल मीडीयावर वाचायला मिळत आहेत. या संपाची परिणती ती न होवो हीच सदिच्छा.

Thursday, June 01, 2017

आज भावे असायला हवे होते

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|| अरविंद उवाच ||

आज भावे असायला हवे होते !

अरविंद विठ्ठल कुळकर्णी

          आज १२ एप्रिल म्हणजे भाषाप्रभू पुरुषोत्तम भास्कर भावे ह्यांची १०७ वी जयंती आहे ० केंद्रात नरेंद्र मोदींचे आणि उत्तर प्रदेशात योगी आदित्यनाथांचे सरकार प्रस्थापित झाले आणि प्रचंड बहुमताने लोकांनी त्यांना राजदंडधारी केले आहे हे पाहून भाव्यांना अमाप आनंद झाला असता ० पन्नासच्या आगेमागे जी आधुनिक मराठी लघुकथा आकारास आली तिच्या चार शिल्पकारांपैकी एक भावे ० तिसऱ्या पिढीचे सर्वश्रेष्ठ कादंबरीकार असे ना सी फडक्यांनी त्यांच्याविषयी म्हटले आहे ० तथापि भावे इतरांपेक्षा वेगळे ते त्यांच्या लघुनिबंधासाठी,शैलीसाठी आणि राजकीय मतांसाठी ० ' रक्त आणि अश्रू ' हा त्यांचा लेखसंग्रह , हे त्यांचे पहिले पुस्तक ,भाव्यांनी नागपुरात महाविद्यालयीन शिक्षण घेत असतांना लिहिले ० त्यातला प्रत्येक लेख आपल्या जिभेला शुद्धतेचे आणि अभिजातचेचे  वळण लागावे म्हणून आजही तोंडपाठ करण्यासारखा आहे . ' सहदेवा ,अग्नी आण !' हा निबंध तेव्हा अनेकांचा तोंडपाठ होता आणि आजही असेल ० तो वाचला की आपली स्वातंत्र्य चळवळ फाळणीच्या दिशेने निर्लज्जपणे कशी पुढे सरकत होती ह्याची स्पष्ट कल्पना येते ० आपल्या देशाचे दोन तुकडे होत आहेत आणि त्याला आपण स्वातंत्र्यप्राप्ती म्हणून उत्सव करीत आहोत ह्या परिस्थितीने भारतीय मन किती घायाळ आणि विव्हळ झाले होते ,होरपळून गेले होते हे समजण्यासाठी हे पुस्तक वाचले पाहिजे ० फाळणीच्या दिवसात भावे स्वतः: बंगालमधील नौखालीला वास्तव्य करून होते ० आपण स्वातंत्र्य मिळवीत आहोत पण त्याची कोणती किंमत देऊन ते पदरात पाडून घेत आहोत ह्याची गणती करण्यासाठी एका गावातून दुसऱ्या गावात ते पायपीट करीत होते ०  अत्याचारित हिंदू माताभगिनींची विचारपूस करण्यासाठी हा पस्तिशीतला मराठी लेखक त्यावेळी नौखालीला  धावून गेला होता .० त्यांचे ' घायाळ ' आणि ' नौका ' हे दोन कथासंग्रह वाचले की काँग्रेसच्या नेतृत्वाखाली लढलेल्या स्वातंत्र्य आंदोलनात हिंदूंनी काय भोगले ह्याची थोडीशी कल्पना येऊ शकते ०

          योगी आदित्यनाथ मार्च २०१७ मध्ये उत्तर प्रदेशाचे मुख्यमंत्री झाले ही घटना , भावे जिवंत असते तर त्यांचे हातून मराठी साहित्याचा मानदंड ठरावा असा आणखी एक स्फूर्तिदायक लेख लिहिला जाण्यास कारणीभूत ठरली असती ० राजकार्यधुरंधर कषायवस्त्रधारी निरिच्छ साधू उत्तर प्रदेशाचा राज्यशकट हाकणार आहे ह्या कल्पनेने हिंदू भावविश्वास झालेला आनंद भाव्यांनी सौष्ठवाची पराकाष्ठा करीत शब्दबद्ध केला असता ० औरंगजेबाने मशिदीत रूपांतर केलेले काशी विश्वनाथाचे मंदिर आदित्यनाथांनी पुन्हा खणखणीत स्वरूपात बांधून काढावे म्हणून आवाहन करणारा लेख त्यांनी लिहिला असता ० काशी विश्वनाथावर भाव्यांनी १९५९ मध्ये दोन लेख लिहिले ते त्यांच्या ' वाघनखे ' ह्या अप्रतिम पुस्तकात समाविष्ट आहेत ०

          हिंदुमहासभा नेते वि घ देशपांडे ह्यांनी कशी विश्वनाथाचे मंदिर हिंदूंना पुन्हा मिळावे म्हणून सत्याग्रह केला तेव्हा त्यावेळच्या काँग्रेस शासनाने त्यांना नुसते अटक केले नाही तर अत्यंत अपमानित केले ० त्याने चिडून भाव्यांनी लिहिले ," ज्या राज्यकर्त्यांनी शेख अब्दुल्लाची त्याच्या नामधारी बंदिवासात जावयासारखी बडदास्त ठेवली ,त्यांनी देशपांडे ह्यांना सश्रम कारावास बहाल केला ० हैदराबादचे रझाकारी मंत्री मीर लायकअली ह्यांना आमच्या अहिंसक राज्यकर्त्यांनी असेच बंगलेदार चैनीत ठेवले होते ० तेथून  ते सहकुटुंब आमच्या  हातावर तुरी देऊन पापस्तानात पळून गेले ० हिंदू प्रजेवर अनन्वित अत्याचार करणाऱ्या आणि अखेर आमच्याशी प्रत्यक्ष युद्ध पुकारणाऱ्या निझामाची आम्ही न्यायासनासमोर प्रकट चौकशी करावयास पाहिजे होती ; व देशद्रोह , बड ,अत्याचार ह्यासाठी जे कुठले कडक शासन निर्बंधाने सांगितले असेल ते त्यास द्यावयास हवे होते , परंतु त्याऐवजी आम्ही निझामास राजप्रमुखपद दिले ० या अमाप संपत्तीचे धनित्व बहाल केले ० "

          भावे म्हणतात, " जातीय जहराने रोमरोमात जळणाऱ्या व हिंदुस्तानच्या एकतेवर विभाजनाचा सुरा चालविणाऱ्या लीगी पुढाऱ्यांची एक पिढीच्या पिढी आज काँग्रेसने जोपासली व जवळ केली आहे ; मोठया सन्माननीय साळसूदपणे ही देशद्रोही व धर्मवेडी माणसे आज काँग्रेसजनांच्या मांडीला मांडी लावून बसली आहेत ० ह्याच काँग्रेसच्या राज्यात श्री वि घ देशपांडे व श्री ह भा भिडे ह्यांच्यासारख्या सज्जनांची ससेहोलपट चालू आहे ० "

          भावे लिहितात," श्री काशीविश्वनाथ मंदिरावर आक्रमण झाले ० मंदिराची मशीद बनवली गेली ० हिंदूंची वास्तू त्यांच्यापासून अन्यायाने छिनावली गेली ० असे जर आहे तर ज्याची वस्तू त्याला परत दिली गेलीच पाहिजे ० हा धर्मजातीपंथनिरपेक्ष न्यायाचा प्रश्न आहे ० हा अन्याय तीनशे वर्षांपूर्वी झाला म्हणून त्या अन्यायाचा काही न्याय होत नाही ० पोर्तुगीजांनी गोवे चारशे वर्षांपूर्वी बळकावले म्हणून काही गोवे पोर्तुगीजांचे होत नाही ० इंग्रजांनी हिंदुस्थानावर दीड शतक राज्य केले म्हणून हिंदुस्थान काही इंग्रजांचा होत नाही ० मूळ वस्तू कोणाची आणि ती छिनावली कोणी ह्याचाच काय तो विचार झाला पाहिजे ० हा न्याय जातीधर्मातीत असला पाहिजे ० शेख अब्दुल्लासारख्या पंचमदळ्याला तुरुंगात देखील अमर्याद सवलती ,कारण तो मुसलमान ; व डॉ शामप्रसादसारख्यांच्या तुरुंगातील मृत्यूची चौकशी नाही , कारण ते हिंदू ० ह्या प्रकारची उफराटी जातीयता ह्या विषयात अनुभवास येत कामा नये ० पण प्रत्यक्षात होत मात्र तसेच आहे ० न्यायाने जे काही सिद्ध आहे ते प्रस्थापित करण्याइतका प्रामाणिकपणा व धैर्य काँग्रेस शासनात नाही ० कारण न्यायाने पाहता भ्रष्टवून बळकावलेली ती वास्तू हिंदूंचीच आहे ०  हिंदूंची वास्तू हिंदूंना परत मिळणे हाच धर्म आहे ० हाच न्याय आहे ० .मानवता व नीतीही ह्यातच आहे ० परम सत्य असे आहे की श्री काशीविश्वनाथ हा ह्या देशाचा मानबिंदू आहे ० ते ह्या देशातील राष्टकांचे पूजास्थान आहे ० आमच्या असंख्यात पूर्वजांनी अगणित वर्षे श्रीकाशीविश्वनाथाच्या नावाने भक्तिपूर्वक जयघोष केले आहेत ० हा ढळलेला मानबिंदू पुनश्च सुप्रतिष्ठित व्हावा अशी वांच्छा त्यांनी बाळगलेली आहे ० श्रीकाशीविश्वनाथावर पडलेला घाव हिंदूंच्या मर्मावर गेला आहे ० कारण तो घाव त्यांच्या धर्मावर ,गौरवावर,परंपरेवर होता ० तो घाव त्यांच्या न्यायावर, संस्कृतीवर,मानवतेवर पडलेला घाव होता ० "

          भावे विचारतात ," ह्या भूमीत अखेर विजयी व्हावयाचे कोणी ? न्यायाने की अन्यायाने ? आक्रमणाने की अनाक्रमणाने ? अत्याचाराने की अनत्याचाराने ? असहिष्णुतेने की सहिष्णुतेने ? देववृत्तीने की पशुवृत्तीने ?  ह्याचाच निर्णय श्रीकाशीविश्वनाथाच्या साक्षीने आम्हास लावावयाचा आहे ० जे औरंगजेबाने केले त्यासच आम्ही अमरपट्टा देणार आहोत काय ? ज्यांनी मानबिंदू सोडले ,मानमर्यादा मोडल्या , देश बुडविला, धर्म बुडविला इहलोक बुडविला आणि परलोकही बुडविला त्यांचीच पतित परंपरा आम्ही पाळणार आहोत काय ? आम्ही पशूतेस वंश होणार आहोत काय ? धर्मांधतेसमोर नमणार आहोत काय ? श्रीकाशीविश्वनाथाची भूमी ललकारून हेच प्रश्न आम्हास विचारीत आहे ० "

           भावे शेवटी विचारतात , " श्रीकाशीविश्वनाथाच्या रूपाने ह्या देशातील न्याय, नीती व धार्मिक स्वातंत्र्य इरेस पडलेले नाही काय ? तो केवळ हिंदूंचाच नव्हे तर साऱ्यांचाच मानबिंदू नव्हे काय ? ह्या मानबिंदूचे पुनर्निमाण व पुनरुत्थान हे ह्या देशातील साऱ्यांचेच कर्तव्य नव्हे काय ? "

          "  जय बाबा विश्वनाथ " ह्या दुसऱ्या  एका लेखात भावे म्हणतात , " प्रत्यक्ष स्मशानात संसाराचे सिंहासन मांडून बसलेल्या महादेवाचा हा देश आहे ० त्या महादेवाचे एकनिष्ठ भक्त ह्या विपरीत काळातही पुकारून ललकार देत आहेत - "जय बाबा विश्वनाथ ! जय बाबा काशिनाथ !! ० पराभवाचा विजय बनवणारा हा मंत्र आहे ० अधर्मातून धर्माकडे नेणारा हा मंत्र आहे ० ह्या भूमीच्या अमर परंपरेचचा हा मंत्र आहे ० हा मंत्र मृत्युंजय महादेवाचा आहे ० अत्याचारी पापास मोक्ष देणारा हा मंत्र आहे ० ह्या मंत्राने चंद्रगुप्त घडविला ० ह्या मंत्राने विक्रमादित्य आकारास आणला ० शिवखङग अभिमंत्रित करणारा हाच तो मंत्र ० मराठ्यांचे धर्मसिंहासन ह्याच मंत्राने भारलेले होते ० हा संजीवक मंत्र ह्या भूमीत युगायुगातून आळविला गेला ० हाच मंत्र काशीविश्वनाथाचे यांत्रिक आजही आळवीत आहेत ० " जय बाबा विश्वनाथ ! " , " जय बाबा काशिनाथ ! " , " हर हर महादेव ! "

          विस्तारभयास्तव हा सगळं लेख येथे देता येत नाही. तो मुळातून वाचला पाहिजे आणि पाठ केला पाहिजे ० त्याचे सामूहिक पठण झाले पाहिजे ० आज पुरुषोत्तम भास्कर भावे असते तर त्यांनी योगी आदित्यनाथांना भरभरून पाठिंबा दिला असता आणि त्यांचा कार्यकाळ यशस्वी व्हावा म्हणून लेखणी झिजविली असती ० ती परंपरा यथाशक्ती आपल्याला चालवायची आहे ० महाराष्ट्रातील आणि उत्तर प्रदेशातील जनता जर एकवटली तर असे कार्य उभे राहील जेणेकरून भारतवर्षाचे  सुख ,समृद्धी आणि शांतता प्रतिपदेच्या चंद्रलेखेप्रमाणे वर्धिष्णू होत राहील ० अस्तु ०

Friday, May 05, 2017

सात दशकातील स्थित्यंतरे

सात दशकातील स्थित्यंतरे

देशाला स्वातंत्र्य मिळाल्यापासून आता सात दशके संपत आली. राष्ट्रजीवनात हा काळ खूप मोठा नसला तरी खूप छोटाही नसतो. या सात दशकांत देशभरात कित्येक स्थित्यंतरे झाली. ती राजकीय, आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक, भाषिक अशा कित्येक पातळींवर झाली. त्यांचा आढावा घेऊन त्यातून पुढचा मार्ग कसा दिसतो ते पहाता येते. राजकीय पक्ष व त्यांचे सरकार हा या आढाव्यातील पहिला विषय अटळपणे ठरतो.

अगदी सारांशात हा आढावा मांडायचा म्हटला तर भारतीय संस्कृति मधील मूल्यांना मागे टाकल्याने व अंतर्बाह्य सुरक्षा आणि परदेशनीतीसाठी चाणक्याला गुरूस्थानी न ठेवल्याने देशाचे बरेच नुकसान झालेले दिसते.

स्वातंत्र्य मिळाले तेंव्हा कांग्रेस हा राजकीय पक्ष निःसंशयपणे लोकांच्या गळ्यांतील ताईत होता. मात्र इतरही पक्षांमधे राजकीय दिग्गज नेते होते, ज्यांची वैचारिक उंची, कामाची तळमळ आणि सामाजिक जाणीव संशयातील होते. त्यामधे जनसंघ, कम्युनिस्ट, सोशॉलिस्ट, आणि सत्तेतील कांग्रेस अशी वैचारिक भिन्नता असली तरी एकमेकांची उंची ओळखून एकमेकांबद्दल आदर व सन्मान होता. जनमानसातही त्यांच्याबद्दल आदर व सन्मान होता. अशा स्थितित पहिली दोन दशके देशभरांत कांग्रेसचेच सरकार राहिले. त्यानंतर हळू-हळू एकेका राज्यांत इतर पक्ष येऊ लागले. कम्युनिस्ट, शेतकरी-कामकरी आणि समाजवादी असे डावे म्हणवणारे पक्ष एकीकडे तर जनसंघ, शिवसेना, हिंदूमहासभा यासारखे उजवे पक्ष दुसरीकडे. या पैकी जनसंघादि स्थानिक पातळीवर तर कम्युनिस्टादि पक्ष राज्यपातळीवर निवडून येऊ लागले. केंद्रात मात्र कांग्रेसचे वर्चस्व मोडून काढण्यासाठी या दोन्ही विरोधी विचारसरणींना एकत्र यावे लागले आणि १९७८ मधे पहिल्यांदा केंद्रात बिगर कांग्रेसी सरकार आले. त्यामधे डावी विचारसरणी अधिक प्रभावी ठरली कारण वेळप्रसंगी कांग्रेसने त्यांना समर्थन देण्याचे धोरण ठेवले. कांग्रेस व डाव्या विचारसरणीची बहुधा सर्व धोरणे संस्कृतिपासून दुरावलेली होती. तेही आधुनिकता, वैज्ञानिकता, पुरोगामी असे बिल्ले चिकटवून. त्याचे दुष्परिणाम आपल्याला मुख्यतः आरोग्य, शिक्षण आणि कृषि क्षेत्रात दिसून आले.

सुमारे चार दशकानंतर केंद्रात भारतीय संस्कृतिवर आधारित विचारसरणीचे पक्ष सत्तेवर आले तेही बरीच समीकरणे जुळवून. एव्हाना त्यांच्याही संस्कृतिबद्दलच्या कित्येक संकल्पना उथळ आणि आधुनिकतेविषयी न्यूनगंड बाळगून जोपासलेल्या होत्या असे दुर्दैवाने म्हणावे लागते. शिवाय त्यांचा प्रभाव इतर राज्यांपर्यंत पोचला नव्हता. आता सातव्या दशकांत मात्र बीजेपीला केंद्रासोबतच कित्येक राज्यांत बहुमत मिळाले आहे, तर मग त्यांच्या दृष्टीला मागील सात दशकांचा प्रवास कसा दिसतो हे महत्वाचे ठरते. नव्याने धोरणांचा विचार करताना आपल्या संस्कृतीतील काही मूल्यांचा, विशेषतः विकेंद्रित अर्थव्यवस्था, भाषांकडून आलेली एकात्मता व ज्ञान आणि निसर्ग-रक्षक विकास या तीन मूल्यांचा विचार आपण कसा करणार हे भविष्यकाळाला वेगळे वळण देईल.

आज सत्तर वर्षांनंतर राजकीय नेत्यांचे चरित्र पार बदलून गेलेले आणि लोकांचे श्रध्दास्थान हरवलेले असे दिसते. ही बाब गंभीर म्हणावी लागेल. यासाठी निवडणूक तंत्र, ढासळणारी नीतिमत्ता, भ्रष्टचार, याबाबत काही ठोस काम करावे लागेल.

विस्थापन

स्वातंत्र्यासोबतच फाळणी आली. देशाचे दोन तुकडे झाले आणि पाकिस्तानातून मोठ्या प्रमाणावर विस्थापितांचे लोंढे येऊ लागले. त्यांच्या पुनर्वसनाचे मोठे काम प्रशासनावर पडले. पंजाब, सिंध आणि बंगाल प्रांतातून आलेल्या विस्थापितांनी मोठया शहरांतून आश्रय घेतला. दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता आणि नागपुर इथे त्यांचे पुनर्वसन झाले. अत्यंत कठोर यातना सोसून त्यांनी केलेला जीवन-संघर्ष आज पुसला गेल्यासारखा वाटतो त्यामुळे नवीन पिढीला त्यांची ओळख क्वचितच होते. मात्र अशीच लोंढेवजा निर्गमने पुढेही झाली.

१९४८ मधे महाराष्ट्राने, खास करून पश्चिम महाराष्ट्राने असेच एक विस्थापन अनुभवले. गांधी वधानंतर ग्रामीण महाराष्ट्रात मोठ्या प्रमाणावर ब्राह्मणांना विस्थापित करण्यांत आले. त्यांचे लोंढे पुण्या-मुंबईत येऊ लागले. कालांतराने यांची पुढील पिढी परदेशात राहू लागली. यातून निर्माण झालेल्या द्वेषाने मराठी मन ढवळून निघाले. त्यापुढील विस्थापन सत्तर-ऐंशीच्या दशकांत पंजाबात घडू लागले. ज्या शिख पंथाचे पहिले नऊ गुरू हे शांतताप्रिय, कवि, आणि उपासक होते आणि ज्यांच्या दहाव्या गुरू गोविंदसिंहांनी हिंदु व शिख धर्मरक्षणासाठी स्वतःसोबतच चार मुलांची प्राणाहुती दिली त्या शिख आणि हिंदू समाजात वैमनस्य निर्माण होऊन त्यातून पंतप्रधानांची हत्या व दिल्लीतील शिख विरोधी दंगली घडून आल्या. त्यापुढील दशकांत श्रीनगर खो-यातील हिंदुंना हाकलून बाहेर काढण्यांत आले व ते विस्थापित आजही जम्मू, दिल्ली सोबत गोव्या सारख्या सुदूर प्रदेशांत रहात आहेत.

युध्द-- चीन, पाकिस्तान, बंगला देश

एवढया अल्पाधीत देशाला विविध अंतर्गत सुरक्षा व बाहेरील युध्द या दोन मोहिमा लढाव्या लागल्या. १९४७-४८ मधे पाकिस्तानी टोळ्यांनी काश्मीरचा एक मोठा भूभाग ताब्यांत घेतला. भारताने लष्करी कारवाई करून एक मोठा भाग वाचवला खरा, पण पाकव्याप्त भागांत घुसून तो सोडवून आणण्याऐवजी ते प्रकरण युनाइटेड नेशन्सच्या समोर नेल्यामुळे ते प्रकरण चिघळत पडले आहे. तिथून पुढील संपूर्ण इतिहास भारताची इच्छा शक्ति कमी पडत असल्याचाच इतिहास आहे.

काश्मीरातील कित्येक शतकांच्या हिंदू-मुस्लीम एकात्मतेला छेद देण्यांत पाकिस्तानी धोरणे यशस्वी होत गेली. सीमेपलीकडून येणा-या घुसखोरांनी फक्त जमीन बळकावण्याचा प्रयत्न नाही केला तर धर्माच्या नांवाने हिंदू-मुस्लीम द्वेष पराकोटीला पोचवला. त्याला समर्थपणे टक्कर देण्यांत आपले धोरण अयशस्वी ठरत गेले. त्याचे गंभीर परिणाम असे झाले की १९९२-९३ मधे श्रीनगर व्हॅलीतून हिंदूंना संपू्रणपणे हुसकावून त्यांची घरे व संपत्ति स्थानिक मुस्लीमांनी ताब्यात घेतली. त्याकाळी जी मुस्लिम पिढी हिंदू-मुस्लीम ऐक्याच्या बाजूने उभी होती ती आता संपूर्णपणे संपलेली आहे व नवीन पिढीला तो इतिहासही माहीत नाही. त्यामुळे धार्मिक यात्रेसाठीही सैन्यदलाचे संरक्षण घ्यावे लागते ही वेळ आली आह.

घटनेतील ३७० कलमामुळे व सरकारी इच्छाशक्ति कमी पडत गेल्याने आज संपूर्ण  काश्मीर खोरे ही एक मोठी समस्या झाली आहे. काश्मीरचे उर्वरित देशासोबत संपूर्ण एकात्म, डेमोग्राफिक बॅलन्स, बलुचिस्तान, गिलगिट, व बजीरीस्तान या पाकव्याप्त प्रदेशांत भारत सरकारचा सकारात्मक व रणनीतीपूर्ण हस्तक्षेप आणि या संपूर्ण प्रदेशाची आर्थिक सुबत्ता असे कांही ठोस उपाय तातडीने अंमलात आणले तरच काश्मीरचा प्रश्न सोडवला जाऊ शकतो.

काश्मीरनंतर १९६२ मधील चीनचे आक्रमण व भारताने त्यांत गमावलेला बराचसा भूभाग हे फक्त भावनिक दृष्टयाच नव्हे तर आंतरराष्ट्रीय सन्मानाच्या दृष्टया देखील भारताला फटका देणारे ठरले व आजही ठरत आहे. त्यावर उपाय करतांना नेपाळ, ब्रह्मदेश, तिबेट, भूटान या भारतीय संस्कृतीशी समरस असलेल्या संस्कृतींचा आपण विचार करायला हवा व त्यांचा सहयोगही मिळवायला हवा.

पाकिस्तानने लादलेल्या १९६६ च्या युध्दात तसेच १९६१ मधे गोवा प्रांत पोर्तुगीजांच्या वसाहतीतून सोडवल्याने भारताची भूमिका वारवणण्यासारखी होती. मात्र १९६६ मधील युध्दसमाप्ती करार प्रसंगी देशाने लालबहादूर
शास्त्रींसारखा खंदा पंतप्रधान गमावला. त्यानंतर १९७१ मधे बांगला देशच्या मुक्ती आंदोलनात भारताने मदत देऊन पाक सैन्यावर निःसंशय विजय मिळवला हा मानाचा शिरपेच. पण १९७१ मधे बांगला देशात असलेले हिंदू-मुस्लीन ऐक्य पुन्हा एकदा संपुष्टात येत असून पुन्हा हिंदू व चकमा विस्थापितांचे लोंढे आणि त्याचसोबत मुस्लिम घुसखोरही मोठ्या प्रमाणात भारतात येऊ लागलेले दिसतात.

घटना, समानता व आरक्षण
स्वातंत्र्यानंतर लगेच घटना समिती नेमण्यांत येऊन जी घटना देशाने स्वीकारली त्यामधे न्याय, स्वातंत्र्य समता व बंधुता ही चार तत्वे गाभा म्हणून स्वीकारली गेली. त्यामधे राजकीय समतेच्या उद्देशाने प्रत्येक सज्ञान स्त्री व पुरूषाला मतदानाचा हक्क आणि सामाजिक समतेसाठी आरक्षणाचे तत्व हे दोन अतिमहत्वाचे घटक होते. कित्येक देशांत स्त्रियांना मतदानाचा हक्क नसतांना भारतीय राज्यघटनेने मात्र स्त्रियांच्या समान हक्कासाठी पुढाकार घेतला. त्याचे फलित आज आपल्याला असे दिसते की स्त्रिया शिकू लागल्या, नोकरीत आल्या, देशाटन करू लागल्या , मुक्तपणे पंख पसरून उडू लागल्या. आज त्या आपल्याला सर्वच क्षेत्रांत दिसतात - डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजिनियर, शिक्षक, उद्योजक, प्रशासनिक व विदेशी सेवांमधे, सैन्यदलात अशा सर्व क्षेत्रात महिलां आपली प्रतिभा दाखवून देत आहेत. परिवाराच्या, समाजाच्या व देशाच्या  रथांचे हे एक चाक जितके समर्थ तितकी रथांची गति चांगली रहाणार.

सामाजिक समता प्रस्थापित व्हावी यासाठी आरक्षण हा लघुगामी पर्याय घटनेत सुचवण्यांत आला. सामाजिक दृष्टया मागे पडलेल्या अनुसूचित जाती व अनुसुचित जमातींसाठी जे आरक्षण लागू केले त्यांत राजकिय सत्तेसाठी वैधानिक संस्थांमधे आरक्षण, शिक्षणक्षेत्रात प्रवेशासाठी आरक्षण आणि सरकारी नोकरीतील आरक्षण असे. तिपदरी उपाय योजले गेले. सुरवातीला दहाच वर्षे आरक्षण पुरे असे जरी घटनाकारांनी म्हटले असले तरी त्याची व्याप्ति व कार्यकाल दोन्हीं वारंवार वाढत राहिले.

याचा एक परिणाम असा झाला की गेल्या सात दशकांत निवडणूकीचे तत्वज्ञान एका घातक वळणावर येऊ ठेपले आहे. जातीयवाद, पैसा आणि दारू इत्यादि निवडणुका जिंकण्याचे तंत्र ठरत गेले. कसेही करून निवडणूक जिंकणे हेच सर्वाधिक महत्वाचे झाले. त्यासाठी जे जातीगत संख्याबल दाखवले जाते त्यामधे आरक्षण हे महत्वाचे
हत्यार ठरते. हे थांबवण्यासाठी इथून पुढे क्रीमी लेयरचा कायदा सरसकट सर्वांना लागू करणे आणि आर्थिक निकषावर अल्पकालीन आरक्षण हा एक उपाय ठरू शकतो. क्रीमी लेयरचा कायदा सर्वांना लागू करण्याने अनुसूचित जातीतील ज्या पोटजाती आतापर्यंत वंचित राहिल्या आहेत त्यांना संधि मिळू शकेल अन्यथा तिथेही सक्षम पोटजातीच अधिक फायदे घेतात असे चित्र दिसून येते.

पंचवार्षिक योजना

देशाच्या समग्र विकासाच्या इच्छेने भारताने पंचवार्षिक योजनांचे सूत्र अवलंबिले. मोठया प्रमाणावर उद्योगधंद्यांना चालना देण्यात आली. उद्योग धंद्यांसाठी जमीन, पाणी, रस्ते, वीज, कर्ज अशा सर्व सवलती दिल्या जाऊ लागल्या.
समाजवादी विचारसरणी पटलेल्या नेहरूंनी पब्लिक सेक्टर ही नवी संकल्पना वापरात आणली आणि पहिल्याच पंचवार्षिक योजनेत कित्येक सरकारी उद्योगांची स्थापना झाली. त्यामधे कोळसा, इस्पात, वीज निर्मिती, रेल्वेचे कारखाने, खते, औषधी, अणुऊर्जा इत्यादि विभिन्न क्षेत्रात सरकारी संस्था व उद्योगधंदे सुरू झाले. एअर इंडिया
ही विमानसेवा आली. अस ठामपणे म्हणता येईल की पहिल्या ३ ते ४ दशकांमधे या सरकारी संस्थांमुळे औद्योगिक विकासाला मोठीच गति लाभली होती. पब्लिक सेक्टरच्या जोडीने व सहकार्याने प्रायव्हेट सेक्टरही पुढे येऊ लागले. ऐंशी व नव्वदाच्या दशकांत त्यांचे संख्याबल आणि भांडवल- बळ वाढू लागले तसे पब्लिक सेक्टर मागे पडत गेले. मग सरकारी निर्बंध काढून टाकून मार्केट इकॉनॉमीचे तत्वज्ञान पुढे आले आणि पब्लिक सेक्टर कंपन्या हळूहळू बंद करण्यांत येऊ लागल्या. मात्र हा सर्व सात दशकांचा कालावधी औद्योगिक क्षेत्रांत भ्रष्टाचाराने कसा व किती विविध त-हेने शिरकाव केला आणि वामनाप्रमाणेच तो कसा विश्वव्यापी झाला यावर प्रदीर्घ लेखनाचा विषय ठरतो.

उद्योगक्षेत्रामधे लघुउद्योग, मध्यम उद्योग, मोठे उद्योग व बलाढय उद्योग असे चार वर्ग पडतात. त्यापैकी आयटी हे क्षेत्र गेल्या चार दशकांत भरभराटीला आले आणि त्याची व्याप्ति या चारही वर्गात होती. त्यात भ्रष्टाचार तुलनेने कमी होता त्यामुळे मध्यम वर्गी नोकरीपेशाला थोडा दिलासा मिळाला खरा पण कित्येक बाबींसाठी तो आजही समाजावर अवलंबून आहे आणि भ्रष्टाचाराला तसेच सामूहिक अपप्रवृत्ति उदाहरणार्थ शैक्षणिक संस्थांची कॅपिटेशन फी त्याला भेडसावतातच. आज आपल्या देशांत भ्रष्टाचाराशिवाय राहू शकणं ही मोठी लक्झरी आहे जी
सर्वसामान्यांना उपलब्ध नाही.

मात्र आयटीच्या क्षेत्राचा दुसरीकडून संकोच होऊ लागला आहे. सुरुवातीला आपल्या इंग्रजी ज्ञानाच्या बळावर पुढे आलेले हे क्षेत्र संगणकावर भारतीय भाषांचा वापर मर्यादित राहिल्याने आणि चीनने चीनी भाषेच्या माध्यमातून आयटी क्षेत्र वाढवल्याने चालू दशकांतच आपला आयटीमधील ऑडव्हाण्टेज कसा लुप्त होणार आहे हा मी वेगळा लेख लिहिला आहे.
आपले निर्यात धोरण बीफ लॉबीला अनुकूल राहिल्याने देशातील पशुधनाचा सातत्याने -हास झाला आहे. पेट्रोलियम मधील अवाढव्य आयात आपण थांबवू शकलेलो नाहीत. संशोधन क्षेत्रात अप्रगत राहिल्याने सोलर एनर्जी सारखा पर्याय आपल्याला अजूनही महागच आहे. खरे तर निसर्गाने भारतावर सोलार एनर्जीची मुक्तहस्ताने उधळण केली आहे. तिचा ग्रामीण भागांत व्हिटामिन डी साठी म्हणजेच आरोग्य रक्षणासाठी अजूनही चांगला उपयोग होतो हे सुदैव.
गेल्या दोन दशकापासून आपले औद्योगिक धोरण अधिकाधिकपणे एफडीआय च्या आहारी जात चाललेले आहे. हा मोठा धोका आहे. अगदी कृषि, कृषि- उद्योग व लघु-उद्योग यांतही एफडिआय शिरत आहे ज्यामुळे आपण सर्व पुन्हा एकदा कंपनी सरकारांचे नोकरदार होणार, हा धोका ओळखला पाहिजे.

कृषि पशु संवर्द्धन
हरित क्रांति, रासायनिक शेती, हायब्रिड बी-बीयाणे, यामुळे अपुऱ्या अन्नधान्याच्या संकटातून देश कसा वाचला इत्यादि चढता आलेख दिसत असतानाच त्यातील धोके ठळक होऊन पुन्हा एकदा सेंद्रिय शेती, लोकल बियाणे याकडे वळण्याची गरज वैज्ञानिक मांडू लागलेत. तसेच पशू धोरणांतही देशी वाण की पश्चिमी वाण, ए-१ दूध की ए-२ हे दूध, देशी कोंबड्या की ब्रयलर जातीच्या अशी चर्चा सुरू होऊन लोकांचा कल पुन्हा एकदा यातील आरोग्यदायक काय ते तपासण्याकडे वळू लागला आहे. हा एक विस्ताराने स्वतंत्र लेखन करण्याचाच विषय आहे.

मूलभूत गरजा व श्रम-विरोधी धोरणे
शिक्षण, आरोग्य, या दोन मूलभूत गरजा व रेव्हेन्यूसाठी पर्यटन या तीनही महत्वाच्या विभागांमधे कांग्रेसचे धोरण नेहमीच भारतीय संस्कृतीच्या विरोधात ठाकलेले दिसले. त्यालाही आधुनिकता, वैज्ञानिकता, पुरोगामी असे बिल्ले चिकटवून. त्यामुळे भारतीय पध्दतीत किती व्यापक विचारसरणी दडलेली आहे, त्याचा आढावा कधीच घेतला गेला नाही.

शिक्षणक्षेत्रात दोन नियम बोकाळले - इंग्रजी म्हणजे स्वर्गाचे द्वार तर भारतीय भाषा म्हणजे भिकारीपणा. दुसरा नियम - श्रम करणे म्हणजे मूर्खपणा, जितके स्मार्ट असाल तितके श्रमांपासून दूर रहा. त्यामुळे शेती निकृष्ट, शहरी जीवन उत्कृष्ट त्यांत पुन्हा सरकारी नोकरी असेल आणि तीही एयर-कण्डीशण्ड खोलीतली, तर फारच छान. मग ती मिळवण्यासाठी जसे लाचलुचपत हे एक साधन झाले तसेच जाती आधारित आरक्षण हे ही एक साधन झाले.
त्यामुळे घटनाकारांना कितीही वाटत असले तरी आरक्षण ही एक प्रदीर्घ कालीन बाब झाली, तो तात्पुरता उपाय राहिला नाही.
पर्यटन --चुकीच्या धोरणांचा धोका  कितीतरी मोठा
मला पर्यटन क्षेत्राबद्दल विशेष मुद्दा मांडायचा आहे. पर्यटन हा मोठा उद्योग व आपल्याला परकीय चलन मिळवून देण्यासाठी एक उत्तम घटक आहे. पण आपले पर्यटकांना आकर्षित करण्याचे धोरण कसे आहे? ते पूर्णपणे आपल्या निसर्गाचा घात करणारे आहे. खरेतर आपल्या पौराणिक वास्तु, मंदिरे, आर्कियॉलॉजी, हा पर्यटनासाठी मोठा मुद्दा उपलब्ध आहे  पण सेक्यूलॅरिझमच्या नांवाखाली आपण तो दुर्लक्षित ठेवला. आपली खाद्य-संस्कृति, वने व वनौषधि, वस्त्रोद्योग व त्यातील कला आणि फॅशन्स, नृत्य -संगीत, ट्राइबल आर्टस आणि ग्रामीण हस्त उद्योग, वन क्षेत्रातील जैव-विविधता, गड-किल्ले, हिमशिखरे, सायकल-मॅरेथॉनसाठी बारा महिने उपयुक्त असलेला निसर्ग, आपले वाङमय आणि तत्वचिंतन, अशा कितीतरी अंगांनी आपला पर्यटन उद्योग वाढवता येतो. देशाअंतर्गत पर्यटन - उद्योग देखील याच आधारांवर वाढवता येतो. मात्र त्यासाठी कल्पकता, योजकता व देशाभिमान पाहिजे. त्याऐवजी आपले पर्यटन सेवन स्टार होटेल्स, दारू, नशा, सेक्स या वळणांवर चाललेले आपण पाहिले. हा ट्रेण्डही तातडीने आणि योजनापूर्वक बदलला तरच आपल्याकडील निसर्ग सुरक्षित राहू शकतो. दारूमुळे महिलांचे हाल, रस्त्यावरील अपघात, नशेमुळे उडता पंजाब सारख्या समस्या, औद्योगिक प्रदूषणामुळे गंगादि सर्वच नद्यांचे गटारीकरण या सारख्या समस्यांना आळा घालण्यासाठी सर्वोच्च न्यायलयावा हस्तक्षेप करावा लागतो व सरकार मात्र या धंध्यात उतरलेल्या मोठ्या उद्योगांच्या पाठीशी उभे रहाते हे गेल्या सात दशकातील चित्र आता बदलेल की नाही या प्रश्नावर आज देशातील मध्यमवर्गीय व त्याखालील समाज लक्ष लाऊन आणि अपेक्षा ठेऊन आहे.
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